लोगों की राय

उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


राजलक्ष्मी ने कहा, “न रहना ही भला है। केवल बड़े आदमी ही मनुष्य हैं? और क्या गरीब बेचारे संसार में कहीं से बह आए हैं? बाल-बच्चों को लेकर घर-गिरस्ती करने की साध क्या उन्हें नहीं होती?” मैंने कहा, “पर इसका क्या यह अर्थ है कि साध होती है इसलिए उसे प्रश्रय देना ही चाहिए?”

राजलक्ष्मी ने पूछा “क्या नहीं मुझे समझा दो।”

कुछ देर चुप रहकर मैंने कहा, “सभी दरिद्रों के सम्बन्ध में मेरा यह मत नहीं है। मेरा मत केवल दरिद्र भले आदमियों के सम्बन्ध में है और मेरा विश्वास है कि तुम उसका कारण भी जानती हो।”

राजलक्ष्मी ने जिद के स्वर में कहा, “तुम्हारा यह मत गलत है।”

मुझ पर भी मानो जिद सवार हो गयी, मैंने कह डाला, “हजार गलत होने पर भी कम से कम तुम्हारे मुँह से तो यह बात शोभा नहीं देती। बंकू के बाप ने सिर्फ बहत्तर रुपयों के लोभ से दोनों बहिनों को व्याह लिया था,- वह दिन अभी इतना पुराना नहीं हुआ है कि भूल गयी होओ। खैर मनाओ कि उस आदमी का पेशा ही यही था। नहीं तो, कल्पना करो, यदि वह तुम्हें अपने घर ले जाता, तुम्हारे दो-चार बाल-बच्चे हो जाते-तब एक दफे सोच देखो कि तुम्हारी क्या दशा होती?”

राजलक्ष्मी की आँखों में जैसे झगड़ने का भाव घना हो उठा; बोली, “भगवान जिन्हें भेजते हैं, उनकी देख-भाल भी कर करते हैं। तुम नास्तिक हो, इसीलिए विश्वास नहीं करते।”

मैंने भी जवाब दिया, “मैं नास्तिक होऊँ चाहे जो होऊँ परन्तु आस्तिक लोगों को भगवान की जरूरत क्या केवल इसीलिए है?- इन सब बच्चों को आदमी बनाने के लिए?”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book