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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी ने क्रुद्ध कण्ठ से कहा, “भले ही वे न बनावें। किन्तु मैं तुम्हारी तरह डरपोक नहीं हूँ। मैं द्वार-द्वार भिक्षा माँगकर भी उन्हें आदमी बनाती। और जो भी हो, नाचने-गाने वाली बनने की अपेक्षा वह मेरे हक में बहुत अच्छा होता?”
मैंने फिर और तर्क नहीं किया। आलोचना बिल्कुल ही व्यक्तिगत और अप्रिय ढंग पर उतर आई थी, इसलिए, मैं खिड़की के बाहर रास्ते की ओर देखता हुआ बैठा रहा।
हमारी गाड़ी धीरे-धीरे सरकारी और गैर सरकारी ऑफिस क्वार्टर्स छोड़कर बहुत दूर आ पड़ी। शनिवार का दिन है, दो बजे के बाद अधिकांश दफ्तरों के क्लर्क छुट्टी पाकर ढाई की ट्रेन पकड़ने के लिए तेजी से चले आ रहे हैं। प्राय: सभी के हाथों में कुछ न कुछ खाद्य-सामग्री है। किसी के हाथ में एक-दो बड़ी-बड़ी मछलियाँ, किसी के रूमाल में बकरे का मांस, किसी के हाथ में गँवई-गाँव में नहीं मिलने वाली हरी तरकारियाँ और फल। सात दिनों के बाद घर पहुँचकर उत्सुक बाल-बच्चों के मुँह पर जरा-सी आनन्द की हँसी देखने के लिए करीब-करीब सभी अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार थोड़ी-बहुत मिठाई चादर के छोर में बाँधकर भागे जा रहे हैं। प्रत्येक के मुँह पर आनन्द और ट्रेन पकड़ने की उत्कण्ठा एक साथ इस तरह परिस्फुटित हो उठी है कि राजलक्ष्मी ने मेरा हाथ खींचकर अत्यन्त कुतूहल के साथ पूछा, “हाँ जी, ये सब लोग इस तरह स्टेशन की ओर क्यों भाग रहे हैं? आज क्या है?”
मैंने घूमकर कहा, “आज शनिवार है। ये सब दफ्तरों के क्लर्क हैं, रविवार की छुट्टी में घर जा रहे हैं।”
राजलक्ष्मी ने गर्दन हिलाकर कहा, “हाँ यही मालूम होता है। और देखो सब एक न एक खाने की चीज लिये जाते हैं। गँवई-गाँव में तो यह सब मिलता नहीं, इसलिए मालूम होता है, बाल-बच्चों को हाथ में देने के लिये खरीदे लिए जाते हैं, क्यों न?”
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