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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“तुम नहीं जानते। इन लोगों के घर जमीन-जायदाद भी है, निश्चय से है।”
उसका मुँह देखकर निराश करते हुए मुझे वेदना हुई, फिर भी, मैंने कहा, “मैं इन लोगों की घर-गिरस्ती का इतिहास खूब घनिष्ठता से जानता हूँ। मैं निश्चयपूर्वक जानता हूँ कि इनमें से चौदह आने लोगों के पास कुछ भी नहीं है। यदि नौकरी चली जाय तो या तो इन्हें भिक्षावृत्ति करनी होगी या फिर पूरे परिवार के साथ उपवास करना होगा। इन लोगों के लड़के-लड़कियों की कहानी सुनोगी?”
राजलक्ष्मी अकस्मात् दोनों हाथ उठाकर चिल्ला उठी, “नहीं-नहीं, नहीं सुनूँगी,- मैं नहीं सुनना चाहती।”
यह बात मैं उसकी आँखों की ओर निहारते ही जान गया कि उसने प्राणपण से आँसुओं को रोक रक्खा है। इसीलिए मैंने और कुछ न कहकर फिर रास्ते की ओर मुँह मोड़ लिया। बहुत देर तक उसकी कोई आहट नहीं मिली। इतनी देर, शायद, अपने आपसे वकालत करके और अन्त में अपने कुतूहल के निकट ही पराजय मानकर उसने मेरे कोट का खूँट पकड़कर खींचा और पलटकर देखते ही करुण कण्ठ से कहा, “अच्छा तो, कहो उनके लड़के-लड़कियों की कहानी। किन्तु तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ, झूठ-मूठ बढ़ाकर मत कहना। दुहाई है तुम्हारी!”
उसकी मिन्नत करने की भाव-भंगिमा देखकर हँसी तो छूटी, किन्तु, हँसा नहीं। बल्कि कुछ अतिरिक्त गम्भीरता से बोला, “बढ़ाकर कहना तो दूर, तुम्हारे पूछने पर भी मैं नहीं सुनाता, यदि तुमने अभी कुछ ही पहले अपने सम्बन्ध में भीख माँगकर बच्चों को आदमी बनाने की बात न कही होती। भगवान जिन्हें भेजते हैं, उनकी सुव्यवस्था का भार भी वे लेते हैं, यह बात अवश्य है। इसे अस्वीकार करूँ तो शायद नास्तिक कहकर फिर भला-बुरा कहोगी; किन्तु सन्तान की जवाबदारी बाप के ऊपर कितनी है और भगवान के ऊपर कितनी है, इन दो समस्याओं की मीमांसा तुम खुद ही करो। मैं जो जानता हूँ केवल वही कहूँगा,- है न ठीक?”
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