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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने कहा, “हाँ।”
उसकी कल्पना तेजी से दौड़ने लगी। इसीलिए, उसने उसी क्षण कहा “आ:, लड़के-लड़कियों में आज कितना उत्साह होगा। कोलाहल मचाएँगे, गले से लिपटकर बाप की गोद में चढ़ने की चेष्टा करेंगे, माँ को खबर देने रसोईघर में दौड़ जाँयगे, घर-घर में आज मानो एक काण्ड-सा मच जायेगा। क्यों न?” कहते-कहते उसका सारा मुँह उज्ज्वल हो उठा।
मैंने स्वीकार करते हुए कहा, “खूब सम्भव है।”
राजलक्ष्मी ने गाड़ी की खिड़की में से और भी कुछ देर उनकी तरफ निहारते रहकर एकाएक एक गहरी नि:श्वास छोड़ दी और कहा, “हाँ जी, उनकी तनखा कितना होगी?”
मैंने कहा, “क्लर्कों की तनख्वाह और कितनी होती है,- यही बीस-पच्चीस तीस रुपये।
राजलक्ष्मी ने कहा- “किन्तु, घर तो इनके माँ है, भाई-बहिन हैं, स्त्री हैं, लड़के-बच्चे हैं।”
मैंने इतना और जोड़ दिया, “दो-एक विधवा बहिनें हैं: शादी-ब्याह, क्रिया-कर्म, लोक-व्यवहार, भलमंसी है; कलकत्ते का भोजन-खर्च है, लगातार रोगों का खर्चं है,-बंगाली क्लर्क-जीवन का सब कुछ इन्हीं तीस रुपयों पर निर्भर रहता है।”
राजलक्ष्मी की मानो साँस ही अटकने लगी। वह बहुत व्याकुल होकर बोल उठी,
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