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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
उत्साह पाकर राजलक्ष्मी का लोभ बढ़ गया। अतिशय क्षुद्र क्लर्क के लिए भी डेढ़ सौ रुपया महीना उसे नहीं जँचा। बोली, “क्या तुम समझते हो कि केवल उसी मासिक पर ही उनका सारा दारोमदार है? ऊपर से भी तो कितना ही पा जाते हैं।”
मैंने कहा, “ऊपर से? प्याला?”
अब उसने कुछ नहीं कहा। वह मुँह भारी करके रास्ते की ओर ताकती हुई बैठी रही। कुछ देर बाद बाहर की ओर दृष्टि रक्खे हुए ही उसने कहा, “तुम्हें जितना ही देखती हूँ तुम्हारे ऊपर से मेरा मन उतना ही हटता जाता है। तुम जानते हो कि तुम्हें छोड़कर मेरी ओर कोई गति नहीं है, इसीलिए तुम मुझे इस कदर छेदते हो!
इतने दिनों बाद, आज शायद पहले ही पहल मैंने उसके दोनों हाथ जोर से अपनी ओर खींच लिये और उसके मुँह की ओर देखकर मानो कुछ कहना भी चाहा; किन्तु इतने में ही गाड़ी स्टेशन के समीप आकर खड़ी हो गयी। एक स्वतन्त्र डिब्बा रिजर्व कर लिया गया था, फिर भी, बंकू कुछ सामान लेकर दोपहर के पहले ही आ गया था। कोचबाक्स पर रतन को देखते ही वह दौड़ आया। मैं हाथ छोड़कर सीधा बैठ गया। जो बात मुँह पर आ गयी थी। वह चुपचाप अन्दर में जाकर छिप गयी।
ढाई बजे की लोकल ट्रेन छूटने ही को थी। हमारी ट्रेन उसके बाद जाती थी। इसी समय एक प्रौढ़ अवस्था का दरिद्र भला आदमी एक हाथ में तरह-तरह की हरी तरकारियों की पोटली और दूसरे हाथ में डण्डी पर बैठा हुआ एक मिट्टी का पक्षी लिये, केवल प्लेटफार्म पर लक्ष्य रक्खे और सब दिशाओं के ज्ञान से शून्य होकर दौड़ता हुआ राजलक्ष्मी के ऊपर आ पड़ा। मिट्टी का खिलौना नीचे गिरकर चूर हो गया। वह हाय-हाय करके शायद उसे बटोरने जा रहा था कि पाण्डेजी ने हुँकार मारकर एक छलाँग में उसकी गर्दन धर दबाई और बंकू छड़ी उठाकर 'अन्धे' आदि कहकर मारने को तैयार हो गया। मैं कुछ दूरी पर अन्यमनस्क-सा खड़ा था,-घबड़ाकर रंगभूमि पर आ गया। वह बेचारा भय और शर्म के मारे बार-बार कहने लगा, “देख नहीं पाया माँ, मुझसे बड़ा कसूर हो गया...”
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