|
उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
||||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने उसे चटपट छुड़ा दिया और कहा, “जो होना था सो हो गया, आप शीघ्र जाइए, आपकी गाड़ी छूट रही है।”
उस बेचारे ने फिर भी अपने खिलौने के टुकड़े इकट्ठा करने के लिए कुछ देर इधर-उधर किया और अन्त में दौड़ लगा दी। किन्तु अधिक दूर नहीं जाना पड़ा, गाड़ी चल दी। तब लौटकर फिर उसने एक दफा क्षमा माँगी और वह उन टूटे टुकड़ों को बटोरने में प्रवृत्त हो गया। यह देखकर मैंने जरा हँसकर कहा, “इससे अब क्या होगा?”
उसने कहा, “कुछ नहीं महाशय, लड़की बीमार है। पिछले सोमवार को घर से आते समय उसने कह दिया था- “मेरे लिए एक खिलौना खरीद लाना।” खरीदने गया तो बच्चू ने गरज समझकर दाम हाँके, “दो आने-एक पैसा भी कम नहीं। खैर वही सही। रामराम करके किसी तरह पूरे आठ पैसे फेंककर ले आया। किन्तु देखिए दुर्भाग्य की बात कि ऐन मौके पर फूट गया, रोगी लड़की के हाथ में न दे सका। बिटिया रोकर कहेगी, “बाबा, लाए नहीं!” कुछ भी हो, टुकड़े ही ले जाऊँ, दिखाकर कहूँगा, बेटी, इस महीने की तनखा पाने पर पहले तेरा खिलौना खरीदूँगा, तब और काम करूँगा।”
इतना कहकर सारे टुकड़े बटोरकर और चादर के छोर में बाँधकर कहने लगा, “आपकी स्त्री को शायद बहुत चोट लग गयी है, मैंने देखा नहीं- नुकसान का नुकसान हुआ और गाड़ी भी नहीं मिली। मिल जाती तो रोगी बिटिया को आधा घण्टे पहले पहुँचकर देख लेता।” कहते-कहते वह फिर प्लेटफार्म की ओर चल दिया। बंकू पाण्डेजी को लेकर किसी काम से कहीं अन्यत्र चला गया था। मैंने एकाएक पीछे की ओर घूमकर देखा, राजलक्ष्मी की आँखों से सावन की धारा की तरह आँसू बह रहे हैं। व्यस्त होकर निकट जाकर पूछा, “ज्यादा चोट आ गयी क्या? कहाँ लगी है?”
|
|||||

i 









