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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
कुछ आगे जाते ही राजलक्ष्मी ने मुझसे धीरे से कहा, “तो फिर वे अनायास ही अपने डब्बे में चल सकते हैं, न? किराया तो देना न होगा- फिर क्यों नहीं उन्हें बुला लेते!”
मैंने कहा, “टिकट तो निश्चय से खरीद लिया गया है- किराए के पैसे नहीं बचेंगे।”
राजलक्ष्मी बोली- “भले ही खरीद लिया गया हो-भीड़ के कष्ट से तो बच जाँयगे।”
मैंने कहा, “उन्हें अभ्यास है, वे भीड़ की तकलीफ की परवाह नहीं करते।”
तब राजलक्ष्मी ने जिद करके कहा, “नहीं-नहीं, तुम उनसे कहो। हम लोग तीन आदमी बातचीत करते हुए जाँयगे, इतना रास्ता मजे से कट जायेगा।”
मैंने समझ लिया कि इस समय उसे अपनी भूल महसूस हो रही है। बंकू और अपने नौकर-चाकरों की नजर में मेरे साथ अकेली अलहदा डब्बे में बैठने की खटक को वह किसी तरह कुछ हलका कर लेना चाहती है। फिर भी मैंने इसको और भी अधिक आँखों में अंगुली डालकर दिखाने के अभिप्राय से लापरवाही के भाव से कहा, “जरूरत क्या है एक अनावश्यक आदमी को डब्बे में बुलाने की? तुम मेरे साथ जितनी चाहो उतनी बातें कर लेना- मजे से समय कट जायेगा।”
राजलक्ष्मी ने मुझ पर एक तीक्ष्ण कटाक्ष निक्षेप करके कहा- “सो मैं जानती हूँ। मुझे छकाने का इतना बड़ा मौका क्या तुम छोड़ सकते हो?”
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