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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी ने आँचल से आँख पोंछकर कहा, “हाँ, बहुत चोट लगी है- परन्तु लगी है ऐसी जगह कि तुम जैसे पत्थर न उसे देख उसे देख सकते हैं और न समझ सकते हैं!”
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श्रीमान् बंकू को बाध्य होकर हमारे लिए स्वतन्त्र डब्बा क्यों रिज़र्व करना पड़ा उनसे जब मैं इस बात की पूछताछ कर रहा था तब राजलक्ष्मी कान लगाकर सुन रही थी। इस समय उनके जरा अन्यत्र जाते ही राजलक्ष्मी ने बिल्कुल ही गले पड़कर मुझे सुना दिया कि अपने लिए फिजूल के खर्च करना वह जितना ही नापसन्द करती है उसके भाग्य से उतनी ही ये सब विडम्बनाएँ उपस्थित हो जाती हैं। वह बोली- “यदि उन लोगों की तृप्ति सेकण्ड क्लास या फर्स्ट क्लास में जाने से ही होती हो तो ठीक है; पर मेरे लिए तो औरतों का डब्बा था। रेलवे कम्पनी को फिजूल ही इतने अधिक रुपये क्यों दिये जाँय?”
बंकू की कैफियत के साथ उसकी माँ की इस मितव्यय-निष्ठा का कोई विशेष सामंजस्य मैं नहीं देख पाया। किन्तु, ऐसी बातें स्त्रियों से कहने से व्यर्थ का कलह होता है। अतएव, चुपचाप मैं केवल सुनता रहा। कुछ बोला नहीं।
प्लेटफार्म की एक बेंच पर बैठकर पूर्वोक्त सज्जन ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। सामने से जाते हुए मैंने पूछा, “आप कहाँ जाँयगे?”
वे बोले, “बर्दवान।”
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