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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
यह बात मुझे अकस्मात् कुछ नयी-सी मालूम हुई। इसमें जो कुछ गूढ़ अर्थ छिपा हुआ था वह धीरे-धीरे सुस्पष्ट-सा होने लगा। सचमुच ही इसमें बहुत-सा सत्य छिपा हुआ है जो अब तक मुझे दृष्टिगोचर नहीं हुआ था।
राजलक्ष्मी बोली, “तुमने तो उस भद्र पुरुष के सम्बन्ध में मजाक किया था किन्तु उसकी बात सुनकर मेरी आँखें कितनी खुल गयी हैं, सो तुम नहीं जानते।”
'नहीं जानता', यह स्वीकार करते ही वह कहने लगी, “नहीं जानते इसके कारण हैं। किसी भी वस्तु को जानने के लिए जब तक मनुष्य के हृदय के भीतर एक तरह की व्याकुलता नहीं उठती तब तक सब कुछ उसकी नजर में धुँधला ही बना रहता है। इतने दिन तुम्हारे मुँह से सुनकर सोचा करती थी कि सचमुच कि सचमुच ही यदि हमारे देश के लोगों का दु:ख इतना अधिक है, सचमुच ही यदि हमारा समाज इतना अधिक अन्धा है, तो उसमें मनुष्य जीता ही क्योंकर है, और उसको मानकर ही क्यों चलता है?”
मैं चुपचाप सुन रहा हूँ, यह देखकर वह आहिस्ते-आहिस्ते कहने लगी, “और तुम भी क्या समझोगे? कभी इन लोगों के बीच रहे नहीं, कभी इन लोगों के सुख-दु:ख भोगे नहीं; इसीलिए बाहर ही बाहर बाहर के समाज के साथ तुलना करके समझते हो कि इन लोगों के कष्टों की शायद कोई सीमा ही नहीं। धनी जमींदार पुलाव खाया करता है। वह अपनी किसी दरिद्र प्रजा को बासी भात खाते देखकर सोचता है कि 'इसके दु:ख की कोई सीमा नहीं है'- जिस तरह वह भूलता है उसी तरह तुम भूलते हो।”
मैंने कहा, “तुम्हारा तर्क यद्यपि न्याय-शास्त्र के नियमानुसार नहीं चल रहा है, फिर भी पूछता हूँ कि तुमने कैसे जाना कि मुझे देश के सम्बन्ध में इससे अधिक ज्ञान नहीं है?”
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