|
उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
||||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी ने कहा, “हो ही कैसे सकता है? दुनिया में तुम्हारे जैसा स्वार्थी कोई भी है क्या? जो केवल अपने ही आराम के लिए भागता फिरता है, वह घर की खबर जानेगा ही कहाँ से? तुम जैसे लोग ही तो समाज की अधिक निन्दा करते फिरते हैं जो समाज से कोई सम्बन्ध ही नहीं रखते, बल्कि उसकी ओर से सर्वथा उपेक्षित रहते हैं। तुम लोग न तो अच्छी तरह पराए समाज को जानते हो और न अच्छी तरह अपने ही समाज को।”
मैंने कहा, “इसके बाद?”
राजलक्ष्मी बोली, “इसके बाद बाहर रहकर बाहरी सामाजिक व्यवस्था देखकर तुम लोग सोच में मरे जाते हो कि हमारी स्त्रियाँ मकान में कैद रहकर दिन-रात काम किया करती हैं, इसलिए उनके समान दु:खी, उनके समान पीड़ित, उनके समान हीन, शायद और किसी देश की स्त्रियाँ नहीं हैं। किन्तु कुछ दिन हमारी चिन्ता छोड़कर केवल अपनी ही चिन्ता कर देखो, अपने को कुछ ऊँचा उठाने की चेष्टा करो!- यदि कहीं कुछ सचमुच का दोष होगा तो वह केवल उसी समय नजर आयेगा- उससे पहले नहीं।”
“इसके बाद?”
राजलक्ष्मी ने क्रुद्ध होकर कहा, “तुम मुझसे मजाक कर रहे हो, यह मैं जानती हूँ। किन्तु, मैं मजाक की बात नहीं कर रही हूँ। घर की मालकिन सब लोगों से खराब खाती-पीती है, कभी-कभी तो नौकरों की अपेक्षा भी। बहुधा उसे नौकरों से भी अधिक मेहनत करनी पड़ती है। किन्तु, तुम इस दु:ख से व्याकुल होकर रोते हुए मत फिरो; हम लोगों को दासी के समान ही बनी रहने दो, दूसरे देशों जैसी रानी बना डालने की चेष्टा मत करो;- मैं यही बात तुमसे कहती हूँ।”
मैंने, कहा, यद्यपि तुम तर्क-शास्त्र के माथे पर पैर देकर उसे डुबा देने की तजबीज कर रही हो, किन्तु, फिर भी यह स्वीकार करता हूँ कि शास्त्रानुसार तर्क करने का रास्ता मुझे भी नहीं मिल रहा है।”
|
|||||

i 









