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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी बोली, “यह मैंने सोच रक्खा है मेरा सारा धन यदि किसी तरह चला जाय, कुछ न बच रहे-एकबारगी निराश्रय हो जाऊं, तो...”
अब फिर बिल्कुल गुमसुम हो रहे। उसकी बात इतनी स्पष्ट थी कि सभी समझ सकते हैं, मुझे भी मसझने में देर न लगी। कुछ देर चुप रहकर पूछा, “यह खयाल कब से आया तुम्हारे मन में?”
राजलक्ष्मी बोली, “जिस दिन अभया की बात सुनी उसी दिन से।”
मैंने कहा, “किन्तु, उन लोगों की जीवन-यात्रा तो बीच में ही खत्म हुई नहीं जाती। भविष्य में वे कितना दु:ख पा सकते हैं, सो तो तुम जानती नहीं।”
वह सिर हिलाकर बोली, “नहीं, जानती नहीं, यह सत्य है; किन्तु वे चाहे कितना ही दु:ख क्यों न पावें, मेरे समान दु:ख किसी दिन न पावेंगे, यह मैं निश्चयपूर्वक कह सकती हूँ।”
और भी कुछ देर चुप रहकर मैंने कहा, “लक्ष्मी, तुम्हारे लिए मैं अपना सर्वस्व त्याग कर सकता हूँ; किन्तु इज्जत का त्याग कैसे करूँ?”
राजलक्ष्मी बोली, “मैं क्या तुमसे कुछ त्यागने को कहती हूँ? इज्जत ही तो मनुष्य की असली चीज है। उसका यदि त्याग नहीं कर सकते तो त्याग की बात ही क्यों मुँह पर लाते हो? तुमसे तो मैंने कुछ भी त्याग करने के लिए नहीं कहा।”
मैंने कहा, “कहा नहीं, सो ठीक है; किन्तु, कर सकता हूँ। इज्जत जाने के बाद पुरुष का जीता रहना एक विडम्बना है। केवल इस इज्जत को छोड़कर तुम्हारे लिए मैं सभी कुछ विसर्जित कर सकता हूँ।”
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