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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
उसने कहा, “इसमें तर्क करने- जैसा कुछ भी नहीं है।”
मैंने कहा, “हो भी, तो वह शक्ति मुझमें नहीं है-बड़ी नींद आ रही है। किन्तु, “तुम्हारी बात एक तरह से समझ रहा हूँ।”
राजलक्ष्मी जरा चुप रहकर बोली, “हमारे देश में चाहे जिस कारण हो, छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, सभी लोगों में रुपयों का लोभ बहुत ही बढ़ गया है। कोई भी थोड़े में सन्तुष्ट होना नहीं जानता, चाहता भी नहीं। इससे कितना अनिष्ट हुआ है, इसका पता मैंने पा लिया है।”
“बात सच है, किन्तु तुमने पता किस तरह पाया?”
राजलक्ष्मी बोली, “रुपयों के लोभ से ही तो मेरी यह दशा हुई है! किन्तु पूर्व काल में शायद इतना लोभ नहीं था।”
मैंने कहा, “इस इतिहास को मैं ठीक-ठीक नहीं जानता।”
वह कहने लगी, “इतना कभी नहीं था। उस समय माता रुपये के लोभ से अपनी बेटी को कभी इस रास्ते पर नहीं ढकेलती, उस समय धर्म का डर था। आज तो मेरे पास रुपयों की कमी नहीं है किन्तु मेरे समान दु:खी भी क्या कोई है? रास्ते का भिखारी भी, मैं समझती हूँ, मुझसे बहुत अधिक सुखी है।”
उसका हाथ अपने हाथ में मैंने रखकर पूछा, “तुम्हें सचमुच ही इतना कष्ट है!”
राजलक्ष्मी ने क्षण-भर मौन रहकर और एक बार आँचल से आँख-मुँह पोंछकर कहा, “मेरी बात मेरे अन्तर्यामी ही जानते हैं।”
इसके बाद दोनों ही गुमसुम हो रहे। गाड़ी की रफ्तार कम होकर वह एक छोटे स्टेशन पर आकर खड़ी हो गयी। कुछ देर बाद उसने फिर चलना शुरू किया। मैंने कहा, “क्या करने से तुम्हारा शेष जीवन सुख से कट सकता है, यह मुझे बतला सकती हो?”
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