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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने कहा, “अर्थमनर्थम्! उसे जाने दो। मैं इसी एक बजे की गाड़ी से बिदा होता हूँ। अभी तो प्रयाग जाता हूँ, इसके बाद जाऊँगा बंगालियों के परमतीर्थ चाकरिस्तान- अर्थात् बर्मा को। यदि समय और सुयोग होगा, तो मिलकर जाऊँगा।”
“मैं कहाँ गयी थी, यह सुनना भी आवश्यक नहीं समझते?”
“नहीं, बिल्कुल नहीं।”
“यह बहाना पाकर क्या तुम एकदम चले जा रहे हो?”
मैंने कहा, “इस पापी मुँह से अब भी कुछ नहीं कह सकता। इस गोरख-धन्धे से यदि पार हो सकूँ तो...”
प्यारी कुछ देर चुपचाप खड़ी रही और बोली, “तुम क्या मुझ पर जो जी चाहे वही अत्याचार कर सकते हो?”
मैं बोला, “जो जी चाहे? बिल्कुल नहीं। बल्कि, जान-अनजान में यदि बिन्दुमात्र अत्याचार किया हो तो उसके लिए क्षमा चाहता हूँ।”
“इसके माने, आज रात को ही तुम चले जाओगे?”
“हाँ।”
“मुझे बिना अपराध दण्ड देने का तुम्हें अधिकार है?”
“नहीं, तिल-भर भी नहीं। किन्तु, यदि मेरे जाने को ही तुम 'दण्ड देना' समझती हो, तो वह अधिकार मुझे जरूर है।”
प्यारी ने हठात् कोई जवाब नहीं दिया। मेरे मुँह की ओर कुछ क्षण चुपचाप देखते रहकर कहा, “मैं कहाँ गयी थी, क्यों गयी थी- नहीं सुनोगे?”
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