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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
“नहीं, मेरी सम्मति लेकर तो तुम वहाँ गयी नहीं थी, जो लौट आकर उसका हाल सुनाओगी। सिवाय इसके; उसके लिए मेरे पास न समय है और न इच्छा।”
प्यारी चोट खाई हुई सर्पिणी की तरह एकाएक फुंकार उठी, “मेरी भी सुनाने की इच्छा नहीं है। मैं किसी की खरीदी हुई बाँदी नहीं हूँ जो कहाँ जाऊँ और कहाँ न जाऊँ, इसकी अनुमति लेती फिरूँ! जाते हो, जाओ!” यों कहकर रूप और अलंकारों की एक हिलोर-सी उठाकर वह तेजी के साथ कमरे से बाहर हो गयी।
आदमी गाड़ी बुलाने गया। कोई घण्टे-भर बाद सदर दरवाजे पर एक गाड़ी के खड़े होने का शब्द सुनकर बैग हाथ में लेकर जा ही रहा था कि प्यारी आकर पीछे खड़ी हो गयी। बोली, “इसे क्या तुम बच्चों का खिलवाड़ समझते हो? मुझे अकेली छोड़कर चले जाओगे, तो नौकर-चाकर क्या सोचेंगे? तुम क्या इन लोगों के सामने भी मुझे मुँह दिखाने योग्य न रक्खोगे?”
पलटकर खड़े होकर कहा, “अपने नौकरों के साथ तुम निपटती रहना - मेरा उससे कोई ताल्लुक नहीं।”
“वह न हो न सही, किन्तु लौटकर मैं बंकू को ही क्या जवाब दूँगी?”
“यही जवाब दे देना कि वे पश्चिम को घूमने चले गये हैं।”,
“इस पर क्या कोई विश्वास करेगा?
“जिस पर विश्वास किया जा सके ऐसी ही कोई बात बनाकर कह देना।”
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