|
उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
||||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैं सब कुछ समझ गया। इस अपमान के सामने बड़ी-बड़ी बातों की उछल-कूद मचाकर बात बढ़ाने की प्रवृत्ति न हुई। जिस तरह चुपचाप पड़ा था, उसी तरह मुँह बन्द किये पड़ा रहा।
राजलक्ष्मी भी बहुत देर तक और कुछ नहीं बोली, ठीक मानो अपनी चिन्ता में मग्न होकर बैठी रही; उसके बाद सहसा बिल्कुल पास ही कहीं से किसी की बुलाहट सुनकर मानो चौंककर उठ खड़ी हुई। रतन को बुलाकर बोली, “गाड़ी जल्दी तैयार करने को कह दे, रतन, नहीं तो फिर रात के ग्यारह बजे की उसी गाड़ी से जाना होगा। यदि ऐसा हुआ तो मुश्किल होगा- रास्ते में ठण्ड लग जायेगी।”
दस ही मिनट के अन्दर रतन ने मेरा बैग ले जाकर गाड़ी पर रख दिया और मेरे बिस्तर बाँधने के लिए इशारा करता हुआ वह पास आ खड़ा हुआ। तबसे अब तक मैंने एक भी बात नहीं की थी और न अब भी कोई प्रश्न किया। कहाँ जाना होगा, क्या करना होगा, कुछ भी बिना पूछे मैं चुपचाप उठकर धीरे-से गाड़ी में जाकर बैठ गया।
कुछ दिन पहले ऐसी ही एक शाम को अपने घर में प्रवेश किया था और आज फिर वैसी ही एक शाम को चुपचाप घर से निकल पड़ा। उस दिन भी किसी ने आदर के साथ ग्रहण नहीं किया था और आज भी कोई स्नेह के साथ बिदाई देने को आगे न आया! उस दिन भी, इसी समय, ऐसे ही घर-घर में शंख बजना शुरू हुआ था और इसी तरह वसु-मल्लिकों के गोपाल-मन्दिर से आरती के घण्टे-घड़ियाल का शब्द अस्पष्ट होकर हवा में बहा आ रहा था। फिर भी, उस दिन से आज के दिन का प्रभेद कितना ज़बर्दस्त है, इस बात को सिर्फ आकाश के देवताओं ने ही देखा।
|
|||||

i 









