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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
बंगाल के एक नगण्य गाँव के टूटे-फूटे जीर्ण घर के प्रति मेरी ममता कभी न थी- उससे वंचित होने को भी मैंने इससे पहले कभी हानिकर नहीं समझा, परन्तु आज अब अत्यन्त अनादर के साथ गाँव छोड़कर चल दिया, और किसी दिन किसी भी बहाने उसमें फिर कभी प्रवेश करने की कल्पना तक को जब मन में स्थान न दे सका, तब यह अस्वास्थ्यकर साधारण गाँव एक साथ सभी तरफ से मेरी आँखों के सामने असाधारण होकर दिखाई देने लगा और जिससे अभी तुरन्त ही निर्वासित होकर निकल पड़ा था, उसी अपने पुरखों के टूटे-फूटे मलिन घर के प्रति मेरे मोह की सीमा न रही।
राजलक्ष्मी चुपके से आकर मेरे सामने के आसन पर बैठ गयी, और, शायद गाँव के परिचित राहगीरों के कुतूहल से अपने को पूरी तरह छिपाए रखने के लिए ही उसने एक कोने में अपना सिर रखकर आँखें मींच लीं।
जब हम लोग रेलवे-स्टेशन के लिए रवाना हुए तब सूरज छिप चुका था। गाँव के टेढ़े-मेढ़े रास्ते के किनारे अपने आप बढ़े हुए करौंदे, झरबेरी और बेंत के जंगल ने संकीर्ण मार्ग को और भी संकीर्ण बना दिया था और दोनों तरफ पंक्तिवार खड़े हुए आम-कटहर के पेड़ों की शाखाएँ सिर से ऊपर कहीं-कहीं ऐसी सघन होकर मिल गयी थीं कि शाम का अंधेरा और भी दुर्भेद्य हो गया था। उसके भीतर से गाड़ी जब अत्यन्त सावधानी के साथ बहुत ही धीमी चाल से चलने लगी तब मैं आँखें मींचकर उस निविड़ अन्धकार के भीतर से न जाने क्या-क्या देखने लगा। मालूम हुआ, इसी रास्ते से किसी दिन बाबा मेरी दीदी को ब्याह कर लाए थे, तब यह रास्ता बारातियों के कोलाहल और पैरों की आहट से गूँज उठा होगा; और, फिर किसी दिन जब वे स्वर्ग सिधारे, तब इसी रास्ते से अड़ोसी-पड़ोसी उनकी अरथी नदी तक ले गये होंगे। इसी मार्ग से ही मेरी मां ने किसी दिन वधू-वेश में गृह-प्रवेश किया था, और एक दिन जब उनके इस जीवन की समाप्ति हुई तब, धूल-मिट्टी से भरे इसी संकीर्ण मार्ग से अपनी माँ को गंगा में विसर्जित करके हम लोग वापस लौटे थे।
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