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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
और 'यद्यपि स्यात्' स्थानाभाव हो, तो पियादों को हुक्म देते ही वे बाजार से और भी एक गाड़ी लाकर हाज़िर कर देंगे। उन्होंने और भी लिखा है कि भोजनादि सम्पन्न करके संध्या से पूर्व ही रवाना हो जाना वांछनीय है। अन्यथा मालकिन साहबा की सुनिद्रा में व्याघात हो सकता है। और इस विषय में विशेष लिखा है कि मार्ग में भयादि कुछ नहीं है, आनन्द से सोती हुई आ सकती हैं।
मालकिन साहबा रुक्का पढ़कर कुछ मुसकराईं। जिसने उसे दिया उससे भयादि के विषय में कोई प्रश्न न करके उन्होंने पूछा, “क्यों भाई, आसपास में कोई तलाव-अलाव बता सकते हो? एक डुबकी लगा आती।”
“है क्यों नहीं, माँ जी। वह रहा वहाँ...”
“तो चलो भइया, दिखा दो” कहती हुई वह उस आदमी को और रतन को साथ लेकर न जाने कहाँ की एक अनजान तलैया में स्नानादि करने चली गयी। बीमारी आदि का भय दिखाना निरर्थक समझकर मैंने प्रतिवाद भी नहीं किया। ख़ासकर इसलिए कि अगर वह कुछ खा-पी लेना चाहती हो, तो इससे वह भी आज के लिए बन्द हो जायेगा।
लेकिन, आज वह दसेक मिनट में ही लौट आई। बैलगाड़ी पर असबाब लद रहा है और मामूली-सा एक बिस्तर खोलकर सवारी वाली गाड़ी में बिछा दिया गया है। मुझसे उसने कहा, “तुम क्यों नहीं इसी वक्त कुछ खा-पी लेते? सभी कुछ तो आ गया है।”
मैंने कहा, “दो!”
पेड़ के नीचे आसन बिछाकर एक केले के पत्ते पर मेरे लिए वह खाना परोस रही थी और मैं निस्पृह दृष्टि से सिर्फ उसकी ओर देख रहा था। इतने में एक मूर्ति ने आकर और सामने खड़े होकर कहा, “नारायण!”
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