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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी ने अपने भीगे बालों पर बायें हाथ से धोती का पल्ला खींचते हुए मुँह उठाकर ऊपर देखा और कहा, “आइए।”
अकस्मात् यह नि:संकोच निमन्त्रण का शब्द सुनकर मुँह उठाकर देखा, तो, एक साधु खड़ा है। बहुत ही आश्चर्य हुआ। उसकी उमर ज्यादा नहीं थी, वह शायद बीस-बाईस के भीतर ही होगा, मगर देखने में जैसा सुकुमार वैसा ही सुन्दर! चेहरा कृशता की ओर ही जा रहा है, शायद कुछ लम्बा होने के कारण ही ऐसा मालूम हुआ, मगर रंग तपे-सोने जैसा। आँखें, भौहें, चेहरा और ललाट की बनावट निर्दोष। वास्तव में, पुरुष का इतना रूप मैंने कभी देखा हो, ऐसा नहीं मालूम हुआ। उसका गेरुआ परिधान-वस्त्र जगह-जगह फटा हुआ है, गाँठें बँधी हुई हैं। बदन पर गेरुआ ढीला कुरता है, उसकी भी यही दशा है; पैरों में पंजाबी जूता है, उसकी हालत भी वैसी ही है। खो जाने पर उसके लिए अफसोस करने की जरूरत नहीं। राजलक्ष्मी ने ज़मीन से सिर टेककर प्रणाम करके आसन बिछा दिया। फिर मुँह उठाकर कहा, “मैं जब तक भोजन परोसने की तैयारी करूँ, तब तक आपको मुँह-हाथ धोने के लिए जल दिया जाय।”
साधु ने कहा, “हाँ हाँ, लेकिन आपके पास मैं दूसरे ही काम के लिए आया था।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “अच्छी बात है, आप भोजन करने बैठिए, और बातें पीछे होंगी। पर लौटने के लिए टिकट ही चाहिए न? सो मैं खरीद दूँगी।” इतना कहकर उसने मुँह फेरकर अपनी हँसी छिपा ली।
साधुजी ने गम्भीरता के साथ जवाब दिया, “नहीं, उसकी जरूरत नहीं। मुझे खबर मिली है कि आप लोग गंगामाटी जा रहे हैं। मेरे साथ एक भारी बॉक्स है, उसे अगर आप अपनी गाड़ी में ले चलें तो अच्छा हो। मैं भी उसी तरफ जा रहा हूँ।”
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