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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


राजलक्ष्मी ने कहा, “इसमें कौन-सी बड़ी बात है; मगर आप खुद?”

“मैं पैदल ही जा सकता हूँ। ज्यादा दूर नहीं, छै-सात कोस ही तो होगा।”

राजलक्ष्मी ने और कुछ न कहकर रतन को बुला के जल देने के लिए कहा और खुद ढंग के साथ अच्छी तरह साधुजी के लिए भोजन परोसने में लग गयी। यह राजलक्ष्मी की खास अपनी चीज है, इस काम में उसका सानी मिलना मुश्किल है।

साधु महाराज खाने बैठे, मैं भी बैठ गया। राजलक्ष्मी मिठाई के बर्तन लिये पास ही बैठी रही। दो ही मिनट बाद राजलक्ष्मी ने धीरे-से पूछा, “साधुजी, आपका नाम?”

साधु ने खाते खाते कहा, “वज्रानन्द।”

राजलक्ष्मी ने कहा, “बाप रे बाप! और पुकारने का नाम?”

उसके कहने के ढंग से मैंने उसकी तरफ देखा तो उसका सारा चेहरा दबी हुई मुस्कराहट से चमक उठा था, मगर वह हँसी नहीं। मैंने भोजन करने में मन लगाया। साधुजी ने कहा, “उस नाम के साथ तो अब कोई सम्बन्ध नहीं रहा। न अपना रहा और न दूसरों का।”

राजलक्ष्मी ने सहज ही हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, “हाँ, सो तो ठीक है।” परन्तु क्षण-भर बाद वह फिर पूछ बैठी, “अच्छा साधुजी, आपको घर से भागे कितने दिन हुए?”

प्रश्न बहुत ही अभद्र था। मैंने निगाह उठाकर देखा, राजलक्ष्मी के चेहरे पर हँसी तो नहीं है, पर जिस प्यारी के चेहरे को मैं भूल गया था, इस समय राजलक्ष्मी की तरफ देखकर निमेष-मात्र में वही चेहरा मुझे याद आ गया। उन पुराने दिनों की सारी सरसता उसकी आँखों, मुँह और कण्ठ-स्वर में मानो सजीव होकर लौट आई है।

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