|
उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
||||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने कहा, “वह भी लगभग ऐसे ही कारण से, मच्छड़ों के मारे। मच्छड़ों का काटना चमड़े से बरदाश्त नहीं हुआ। अच्छा...”
साधु ने हँसकर कहा, “मुझे आप वज्रानन्द ही कहा कीजिएगा। आपका नाम...”
मुझसे पहले राजलक्ष्मी ने ही जवाब दिया। बोली, “इनके नाम से क्या होगा। उमर में ये बहुत बड़े हैं, इन्हें आप भइया कहा कीजिएगा। और मुझे भी भाभी कहें तो मैं नाराज न हूँगी। मैं भी तो उमर में तुमसे चार-छै साल बड़ी ही हूँगी।”
साधुजी का चेहरा सुर्ख हो उठा। मैंने भी इतनी आशा नहीं की थी। आश्चर्य के साथ मैंने देखा कि वही है। वही स्वच्छ, सरल, स्नेहातुर, आनन्दमयी। वही जिसने मुझे किसी भी तरह श्मशान में नहीं जाने दिया और किसी भी हालत में राजा के संसर्ग में नहीं टिकने दिया,- यह वही है। जो लड़का अपने कहीं के स्नेह-बन्धन को तोड़कर चला आया है, उसकी सम्पूर्ण अज्ञात वेदना ने राजलक्ष्मी के समस्त हृदय को मथ डाला है। किसी भी तरह इसे वह फिर से घर लौटा देना चाहती है।
साधु बेचारे ने लज्जा के धक्के को सँम्हाजलते हुए कहा, “देखिए, भइया कहने में मुझे ऐसी कोई आपत्ति नहीं, मगर हम संन्यासी लोगों को किसी को इस तरह नहीं पुकारना चाहिए।”
राजलक्ष्मी लेशमात्र भी अप्रतिभ न हुई। बोली, “क्यों नहीं! भइया की बहू को संन्यासी लोग कोई मौसी कहकर तो पुकारते नहीं, और बुआ कहते हों सो भी नहीं, इसके सिवा मुझे तुम और क्या कहकर पुकार सकते हो?”
|
|||||

i 









