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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
लड़का निरुपाय होकर अन्त में सलज्ज हँसते हुए चेहरे से बोला, “अच्छी बात है। छै-सात घण्टे और भी हूँ आपके साथ, इस बीच में अगर जरूरत पड़ी तो वही कहूँगा।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “तो कहो न एक बार!”
साधु हँस पड़े, बोले, “जरूरत पड़ेगी तो कहूँगा, झूठमूठ पुकारना ठीक नहीं।”
राजलक्ष्मी ने उसकी पत्तल में और भी चार-पाँच 'सन्देश' और बरफी परोसकर कहा, “अच्छा, उसी से मेरा काम चल जायेगा। मगर जरूरत पड़ने पर मैं क्या कहकर तुम्हें बुलाऊँ, सो कुछ समझ में नहीं आता।” फिर मेरी तरफ इशारा करके कहा, “इन्हें तो बुलाया करती थी। 'संन्यासी महाराज' कह के। सो अब हो नहीं सकता, घुटाला हो जायेगा। अच्छा, तो मैं तुम्हें 'साधु देवर' कहा करूँ, क्या कहते हो?”
साधुजी ने आगे तर्क नहीं किया, अत्यन्त गम्भीरता के साथ कहा, “अच्छा, सो ही सही।”
वे और बातों में चाहे जैसे हों, पर देखा कि खाने-पीने के मामले में उन्हें काफी रसज्ञता है। पछाँह की उमदा मिठाइयों की वे कदर करते हैं, और यही वजह है कि किसी वस्तु का उन्होंने असम्मान नहीं किया। एक तो बड़े जतन और परम स्नेह के साथ एक के बाद एक चीज परोसती जाती थी, और दूसरे सज्जन चुपचाप बिना किसी संकोच के गले के नीचे उतारते जाते थे। मगर मैं उद्विग्न हो उठा। मन-ही-मन समझ गया कि साधुजी पहले चाहे कुछ भी करते रहे हों, परन्तु, फिलहाल इन्हें ऐसी उपादेय भोज्य सामग्री इतनी ज्यादा तादाद में सेवन करने का मौका नहीं मिला है। परन्तु, कोई अगर अपनी दीर्घकाल व्यापी त्रुटि को एक ही बार में एक साथ दूर करने का प्रयत्न करे, तो उसे देखकर दर्शकों के लिए धैर्य की रक्षा करना मुश्किल ही नहीं असम्भव हो जाता है। लिहाजा राजलक्ष्मी के और भी कई पेड़े और बरफी साधुजी की पत्तल में रखते ही अनजान में मेरी नाक और मुँह से एक साथ इतना बड़ा दीर्घ नि:श्वास निकल पड़ा कि राजलक्ष्मी और उसके नये कुटुम्बी दोनों ही चौंक पड़े। राजलक्ष्मी मेरे मुँह की ओर देखकर झटपट कह उठी, “तुम कमजोर आदमी हो, चलो उठकर मुँह-हाथ धो लो। हम लोगों के साथ बैठे रहने की क्या जरूरत है?”
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