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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
रतन पीछे ही खड़ा था, गरदन हिलाकर क्या जाने क्या कहते-कहते, शायद मालकिन की आँख के गुप्त इशारे से सहसा रुक गया।
साधु ने राजलक्ष्मी की ओर देखकर कहा, “इससे आपको कष्ट नहीं होता?”
उत्तर में राजलक्ष्मी सिर्फ जरा हँस दी, परन्तु मैंने कहा, “इस बात को आप प्रत्यक्ष और अनुमान किसी तरह भी नहीं जान सकते। हाँ, आँखों से जो कुछ देखा है उसमें, शायद, दो-एक दिन और भी जोड़े जा सकते हैं।”
राजलक्ष्मी ने प्रतिवाद करते हुए कहा, “तुमने देखा है आँखों से?- कभी नहीं।”
मैंने इसका जवाब नहीं दिया, और साधुजी ने भी फिर कोई प्रश्न नहीं किया। समय की तरफ खयाल करके वे चुपचाप भोजन समाप्त करके उठ बैठे।
रतन और उसके साथी दो जनों को खाते-पीते बहुत देर हो गयी। राजलक्ष्मी ने अपने लिए क्या व्यवस्था की, सो वही जाने। हम लोग गंगामाटी के लिए जब रवाना हुए तब शाम हो चुकी थी। एकादशी का चाँद अब तक उज्ज्वल न हुआ था, और अन्धकार भी कहीं कुछ न था। असबाब की दोनों गाड़ियाँ सबसे पीछे, राजलक्ष्मी की गाड़ी बीच में और हम लोगों की गाड़ी अच्छी होने के कारण सबसे आगे थी। साधुजी को पुकारकर मैंने कहा, “भाई साहब, पैदल तो चलते ही रहते हो, इसकी तुम्हें कोई कमी नहीं, आज-भर के लिए, न हो तो, मेरी ही गाड़ी पर आ जाओ।”
साधु ने कहा, “साथ ही तो चल रहे हैं, न चल सकूँगा तो बैठ लूँगा, मगर अभी जरा पैदल ही चलूँ।”
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