|
उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
||||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी ने दाँतों-तले जीभ दबाकर गम्भीरता के साथ कहा, “छि छि, ऐसी बात औरतों से नहीं कहना चाहिए, लालाजी। मैं यह सब कुछ नहीं खाती, मुझसे बरदाश्त नहीं होता। नौकर, तो उनके लिए काफी है। आज रात-भर की ही बात है, जो कुछ मिल जाय, मुट्ठी-भर चिउड़ा-इउड़ा खाकर जरा पानी पी लेने से ही मेरा काम चल जायेगा। लेकिन, तुम अगर भूखे उठ गये, तो थोड़ा-बहुत जो कुछ मैं खाती हूँ सो भी न खाऊँगी। विश्वास न हो तो इनसे पूछ लो।” इतना कहकर उसने मुझसे अपील की। मैंने कहा, “यह बात सच है, इसे मैं हलफ उठाकर कहने को तैयार हूँ। साधुजी, झूठमूठ बहस करने से कोई लाभ नहीं। भाई साहब, बन सके तो बर्तन को औंधा करके उड़ेलवाने तक सेवन करते चले जाओ; नहीं तो, फिर यह किसी काम में ही नहीं आयेगा। यह सब सामान रेलगाड़ी में आया है। लिहाजा भूखों मर जाने पर भी कोई इन्हें तिल-भर भी नहीं खिला सकता। यह ठीक बात है।”
साधु ने कहा, “मगर यह मिठाई तो गाड़ी की छुई हुई नहीं मानी जाती!”
मैंने कहा, “इसकी मीमाँसा तो मैं इतने दिनों में भी खतम न कर सका भाई साहब, तब तुम क्या एक ही बैठक में फैसला कर डालोगे? इससे तो बल्कि हाथ का काम खतम करके उठ बैठना अच्छा, नहीं तो सूरज डूब जाने पर शायद चिउड़ा पानी भी गले से नीचे उतारने की नौबत न आयेगी। मेरा कहना है कि दो-चार घण्टे तो तुम साथ में हो ही, शास्त्र का विचार समझा सको तो रास्ते में समझा देना, उससे काज न होगा तो कम-से-कम अकाज न बढ़ेगा। इस वक्त जो हो रहा है, वही होने दो।”
साधु ने पूछा, “तो क्या दिन-भर से इन्होंने कुछ खाया ही नहीं?”
मैंने कहा, “नहीं। इसके सिवा कल भी क्या जाने क्या था, सुन रहा हूँ कि दो-चार फल-फूल के सिवा कल भी और कुछ मुँह में नहीं दिया है।”
|
|||||

i 









