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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
उसके उद्वेग ने मानो मुझ तक को चोट पहुँचाई। साधु कुछ देर चुप रहकर धीरे-से बोले, “मगर हम लोगों के तो घर-द्वार नहीं है, हम लोग तो पेड़ तले ही रहा करते हैं, जीजी।”
अबकी बार राजलक्ष्मी भी क्षण-भर मौन रहकर बोली, “सो जीजी की आँखों के सामने नहीं। रात के वक्त भाई को मैं निराश्रय नहीं छोड़ सकती। आज मेरे साथ चलो, कल मैं खुद ही तैयारी करके भेज दूँगी।”
साधु चुप रहे। राजलक्ष्मी ने रतन को बुलाकर कह दिया कि बिना उनसे पूछे गाड़ी की कोई चीज स्थानान्तरित न की जाय। अर्थात् संन्यासी महाराज का बॉक्स आज रात-भर के लिए रोक रक्खा गया।
मैंने कहा, “तो फिर क्यों झूठमूठ को ठण्ड में तकलीफ उठा रहे हो भाई साहब, आ जाओ न मेरी गाड़ी में।”
साधु ने जरा कुछ सोचकर कहा, “अभी रहने दो। जीजी के साथ ज़रा बातचीत करता हुआ चल रहा हूँ।”
मैंने भी सोचा कि ठीक है और ताड़ गया कि अभी साधु बाबा के मन में नये सम्बन्ध को अस्वीकार करने का द्वन्द्व चल रहा है। मगर फिर भी, अन्त तक बचाव न हो सका। सहसा, जबकि उन्होंने अंगीकार कर ही लिया, तब बार-बार मेरे मन में आने लगा कि जरा सावधान करके उनसे कह दूँ, 'महाराज, भाग जाते तो अच्छा होता। अन्त में कहीं मेरी-सी दशा न हो!'
लेकिन, मैं चुप ही रहा।
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