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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
दोनों की बातचीत धड़ल्ले से होने लगी। बैलगाड़ी के झकझोरों और ऊँघाई के झोंकों में, बीच-बीच में उनकी बातचीत का सूत्र खोते रहने पर भी, कल्पना की सहायता से उसे पूरा करते हुए रास्ता तय करने में मेरा समय भी बुरा नहीं बीता।
शायद मैं जरा तन्द्रा-मग्न हो गया, सहसा सुना, पूछा जा रहा है, “क्यों आनन्द, तुम्हारे उस बॉक्स में क्या-क्या है, भाई?”
उत्तर मिला, “कुछ किताबें और दवा-दारू है जीजी।”
“दवा-दारू क्यों? तुम क्या डॉक्टर हो?”
“मैं तो संन्यासी हूँ। अच्छा, आपने क्या सुना नहीं जीजी, आपके उस तरफ हैजा फैल रहा है?”
“नहीं तो। यह बात तो हमारे गुमाश्ते ने नहीं जताई। अच्छा, लालाजी, तुम हैजे को आराम कर सकते हो?”
साधुजी ने जरा मौन रहकर कहा, “आराम करने के मालिक तो हम लोग नहीं दीदी, हम लोग तो सिर्फ दवा देकर कोशिश कर सकते हैं। मगर इसकी भी जरूरत है, यह भी उन्हीं का आदेश है।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “संन्यासी भी दवा दिया करते हैं, ठीक है, मगर सिर्फ दवा देने ही के लिए संन्यासी नहीं बना जाता। अच्छा आनन्द, तुम क्या सिर्फ इसीलिए संन्यासी हुए हो भइया?”
साधु ने कहा, “सो मैं ठीक नहीं जानता जीजी, मगर हाँ, देश की सेवा करना भी हम लोगों का एक व्रत है।”
“हम लोगों का? तो शायद तुम लोगों का एक दल होगा न, लालाजी?”
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