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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
साधु ने कहा, “बन सके तो अब मत लौटना, जीजी। इन सब गरीब अभागों को तुम लोग छोड़कर चली गयी हो, इसी से तो इनका दु:ख कष्ट चौगुना बढ़ गया है। जब पास थीं तब भी तुमने इन्हें कष्ट न दिया हो सो बात नहीं, मगर दूर रहकर इतना निर्मम दु:ख उन्हें न दे सकी होगी। तब जैसे दु:ख दिया है; वैसे दु:ख बँटाया भी है। जीजी, देश का राजा अगर देश ही में रहे तो देश का दु:ख-दैन्य शायद इस तरह गले तक न भर उठा करे। और, इस 'गले तक भरने' का मतलब क्या है और तुम लोगों को शहर-वास के लिए सर्व प्रकार आहार-विहार का सामान जुटाने का अभाव और अपव्यय क्या है, इस चीज को अगर एक बार आँखें पसारकर देख सकतीं जीजी...”
“क्यों आनन्द, घर के लिए तुम्हारा मन चंचल नहीं होता?...”
साधु ने संक्षेप में कहा, “नहीं।”
वह बेचारा समझा नहीं, परन्तु मैं समझ गया कि राजलक्ष्मी ने उस प्रसंग को दबा दिया, महज इसलिए कि उससे सहा नहीं जाता था।
कुछ देर मौन रहकर राजलक्ष्मी ने व्यथित कण्ठ से पूछा, “घर पर तुम्हारे कौन-कौन हैं?”
साधु ने कहा, “मगर घर तो मेरा अब रहा नहीं।”
राजलक्ष्मी फिर बहुत देर तक नीरव रहकर बोली, “अच्छा आनन्द, इस उमर में संन्यासी होकर क्या तुमने शान्ति पाई है?”
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