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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
साधु ने हँसकर कहा, “अरे बाप रे! संन्यासी को इतना लोभ! नहीं जीजी, मैंने तो दूसरों के दु:ख का थोड़ा-सा भार लेना चाहा है, और सिर्फ वही पाया है।”
राजलक्ष्मी फिर चुप रही। साधु ने कहा, “वे शायद सो गये होंगे, लेकिन अब जरा उनकी गाड़ी में जाकर बैठूँ। अच्छा जीजी, कभी दो-चार दिन के लिए अगर तुम लोगों का अतिथि बनकर रहूँ तो क्या वे नाराज होंगे?”
राजलक्ष्मी ने कहा, “वे कौन? तुम्हारे भाईसाहब?”
साधुजी ने जरा हँसकर कहा, “अच्छा, यही सही।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “और मैं नाराज हूँगी या नहीं, सो तो पूछा ही नहीं। अच्छा, पहले चलो तो एक बार गंगामाटी, उसके बाद इस बात का विचार किया जायेगा।”
साधुजी ने क्या कहा, सुन न सका, शायद कुछ कहा ही नहीं। थोड़ी देर बाद मेरी गाड़ी में आकर पुकारा, “भाई साहब, आप जाग रहे हैं?”
मैं जाग ही रहा था, पर कुछ बोला नहीं! फिर वे मेरे पास ही थोड़ी-सी जगह निकालकर अपना फटा कम्बल ओढ़कर पड़ रहे। एक बार तबियत तो हुई कि जरा खिसककर बेचारे के लिए थोड़ी-सी जगह और छोड़ दूँ, परन्तु हिलने-डुलने से कहीं उन्हें शक न हो जाय कि मैं जाग रहा हूँ या मेरी नींद उचट गयी है और इस गम्भीर निशीथ में फिर एक बार देश की सुगम्भीर समस्या की आलोचना होने लगे, इस डर से मैंने करुणा प्रकट करने की चेष्टा तक न की।
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