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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
सबसे बढ़कर उत्साह देखा गया संन्यासी महाशय में। जो कुछ उनकी निगाह में पड़ा उसी पर वह उच्च कण्ठ से आनन्द प्रकट करने लगे, जैसे ऐसा और कभी उन्होंने देखा ही न हो। मैं, शोरगुल न मचाने पर भी, मन-ही-मन खुश ही हुआ। राजलक्ष्मी अपने भइया के लिए रसोई में चाय बना रही थी, इसलिए उसके चेहरे का भाव आँखों से तो नहीं दिखाई दिया, परन्तु मन का भाव किसी से छिपा भी न रहा। सिर्फ साथ नहीं दिया तो एक रतन ने। वह मुँह को उसी तरह फुलाए हुए एक खम्भे के सहारे चुपचाप बैठा रहा।
चाय बनी। साधुजी कल की बची हुई मिठाई के साथ चुपचाप दो प्याला चाय चढ़ाकर उठ बैठे और मुझसे बोले, “चलिए न, जरा घूम-फिर कर गाँव देख आवें। बाँध भी तो ज्यादा दूर नहीं, उधर के उधर ही नहा भी आयेंगे। जीजी, आइए न, जमींदारी देखभाल आवें। शायद शरीफ लोग तो कोई होंगे नहीं, शरम करने की भी विशेष कोई जरूरत नहीं। जायदाद है अच्छी, देख के लोभ होता है।”
राजलक्ष्मी ने हँसकर कहा, “सो तो मैं जानती हूँ। संन्यासियों का स्वभाव ही ऐसा होता है।”
हमारे साथ रसोइया ब्राह्मण तथा और भी एक नौकर आया था। वे दोनों रसोई की तैयारी कर रहे थे। राजलक्ष्मी ने कहा, “नहीं महाराज, तुम्हारे हाथ ऐसी ताजी मछली सौंपने का हिसाव नहीं पड़ता, नहा के लौटने पर रसोई मैं ही चढ़ाऊँगी।” यह कहकर वह हमारे साथ चलने की तैयारी करने लगी।
अब तक रतन ने किसी बातचीत या काम में साथ नहीं दिया था। हम लोग जाने लगे तो वह अत्यन्त धीर-गम्भीर स्वर में बोला, “माँ जी, उस बाँध या ताल, न जाने इस मुए देश के लोग क्या कहते हैं, उसमें आप मत नहाइएगा। बड़ी जबरदस्त जोंकें हैं उसमें, एक-एक, सुनते हैं, हाथ-हाथ भर की।”
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