|
उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
||||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
दूसरे ही क्षण राजलक्ष्मी का चेहरा मारे डर के फक पड़ गया, “कहता क्या है रतन, उसमें क्या बहुत जोंकें हैं?”
रतन ने गरदन हिलाकर कहा, “जी हाँ, सुना तो ऐसा ही है।”
साधु ने डपटकर कहा, “जी हाँ, सुन तो आया ही होगा! इस नाई ने सोच-सोचकर अच्छी तरकीब निकाली है!” रतन के मन का भाव और जाति का परिचय साधु ने पहले ही से प्राप्त कर लिया था; हँस के कहा, “जीजी, इसकी बात मत सुनो, चलो चलें। जोंकें हैं या नहीं, इस बात की परीक्षा न हो तो हम ही लोगों से करा लेना।”
मगर उनकी जीजी एक कदम भी आगे न बढ़ीं। जोंक के नाम से एकदम अचल होकर बोलीं, “मैं कहती हूँ, आज न हो तो रहने दो, आनन्द, नयी जगह ठहरी, अच्छी तरह बिना जाने-समझे ऐसा दु:साहस करना, ठीक नहीं होगा। रतन, तू जा भइया, यहीं पर दो कलसे पानी कुआँ से ले आ।” मुझे आदेश मिला, “तुम कमजोर आदमी हो, सो कहीं किसी अनजान बाँध-आँध में नहा-नुहू मत आना। घर पर ही दो लोटा पानी डालकर आज का काम निकाल लेना।”
साधुजी ने हँसकर कहा, “और मैं ही क्या इतना उपेक्षणीय हूँ जीजी, जो मुझे ही सिर्फ उस जोंकोंवाले तालाब में पठाए देती हो?”
बात कोई बड़ी नहीं थी, मगर इतने ही से राजलक्ष्मी की आँखें मानो सहसा डबडबा आईं। उसने क्षण-भर नीरव रहकर, अपनी स्निग्ध दृष्टि से मानो उन्हें अभिषिक्त करते हुए कहा, “तुम तो भइया, आदमी के हाथ से बाहर हो। जिसने माँ-बाप का कहना नहीं माना, वह क्या कहीं की एक अनजान अपरिचित बहिन की बात रखेगा?”
|
|||||

i 









