|
उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
||||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
साधुजी जाने के लिए उद्यत होकर सहसा जरा ठहरकर बोले, “यह अनजान अपरिचित होने की बात मत कहो, बहिन। आप सब लोगों को पहिचानने के लिए ही तो घर छोड़कर निकला हूँ, नहीं तो मुझे इसकी क्या जरूरत थी, बताइए?” इतना कहकर वे जरा तेजी से बाहर चले गये, और मैं भी धीरे से उनके साथ हो लिया।
हम दोनों ने मिलकर खूब घूम-फिर के गाँव देख-भाल लिया। गाँव छोटा है, और जिन्हें हम छोटी जात कहते हैं, उन्हीं का है। वास्तव में, दो घर तम्बोली और एक घर लुहार के सिवा गंगामाटी में ऐसा कोई घर नहीं जिसका पानी लिया जो सके। सभी घर डोम और बाउरियां के हैं। बाउरी लोग बेंत का काम और मजूरी करते हैं और डोम लोग टोकनी, सूप, डलिया वगैरह और पोड़ामाटी गाँव में बेचकर जीविका चलाते हैं। गाँव के उत्तर की तरफ पानी के निकास का जो बड़ा नाला है, उसी के उस पार पोड़ामाटी है। सुनने में आया कि वह गाँव बड़ा है, और उसमें ब्राह्मण, कायस्थ और अन्यान्य जातियों के भी बहुत-से घर हैं। अपने कुशारी महाशय का घर भी उसी पोड़ामाटी में है। मगर दूसरों की बात पीछे कहूँगा, फिलहाल अपने गाँव की जो हालत आँखों से देखी, उससे मेरी दृष्टि आँसुओं से धुँधली हो आई। बेचारों ने अपने-अपने घरों की जी-जान से छोटा बनाने की कोशिश करने में कुछ उठा नहीं रखा है, फिर भी इतने छोटे-छोटे घरों के छाने लायक सूखा घास भी इस सोने के देश में, उनके भाग्य से नहीं जुटता। बीता-भर जमीन तक किसी के पास नहीं, सिर्फ डलिया-टोकनी-सूप बनाकर और दूसरे गाँव में सद्गृहस्थों को पानी के मोल बेचकर किस तरह इन लोगों की गुजर होती है, मैं तो सोच ही न सका। फिर भी, इसी तरह इन अशुचि अस्पृश्यों के दिन कट रहे हैं और शायद इसी तरह हमेशा से कटे हैं, परन्तु किसी ने भी किसी दिन इसका जरा खयाल तक नहीं किया। सड़क के कुत्ते जैसे पैदा होकर कुछ वर्ष तक जैसे-तैसे जिन्दा रहकर न जाने कहाँ, कब कैसे मर जाते हैं-उनका जैसे कहीं कोई हिसाब नहीं रखता, इन अभागों का भी वही हाल है, मानो, देशवासियों से वे इससे ज्यादा और कुछ दावा ही नहीं कर सकते। इनका दु:ख इनकी दीनता, इनकी सब तरह की हीनता अपनी और पराई दृष्टि में इतनी सहज और स्वाभाविक हो गयी है कि मनुष्य के पास ही मनुष्य के इतने बड़े जबरदस्त अपमान से कहीं किसी के भी मन में लज्जा का रंच-मात्र भी संचार नहीं होता। मगर, साधुजी इधर जो मेरे चेहरे की तरफ देख रहे थे, सो मुझे मालूम ही नहीं हुआ। वे सहसा बोल उठे, “भाई साहब, यही है देश की सच्ची तसवीर। लेकिन, मन में मलाल लाने की जरूरत नहीं। आप सोच रहे होंगे कि ये बातें इन्हें दिन-रात सताया करती हैं, मगर यह बात कतई नहीं।”
|
|||||

i 









