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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
साधु ने कहा, “हाँ जीजी, जाता हूँ। अभी से रवाना न होने से पहुँचने में बहुत रात हो जायेगी।”
“वहाँ कहाँ ठहरोगे, कहाँ सोओगे? अपना आदमी तो वहाँ कोई होगा नहीं।”
“पहले पहुँचूँ तो सही।”
“लौटोगे कब?”
“सो तो अभी नहीं कहा जा सकता। काम की भीड़ में अगर आगे न बढ़कर गया, तो किसी दिन लौट भी सकता हूँ।”
राजलक्ष्मी का मुँह पहले तो फक पड़ गया, फिर उसने जोर से अपना सिर झटककर रुँधे हुए कण्ठ से कहा, “किसी दिन लौट भी सकते हो? नहीं, यह हरगिज नहीं हो सकता।”
क्या नहीं होगा सो समझ में आ गया, इसी से साधु ने प्रत्युत्तर में सिर्फ जरा म्लान हँसी हँसकर कहा, “जाने का कारण तो आपको बता ही चुका हूँ।”
“बता चुके हो? अच्छा, तो जाओ” इतना कहते-कहते राजलक्ष्मी प्राय: रो दी, और जल्दी से कमरे के भीतर चली गयी। क्षण-भर के लिए साधुजी स्तब्ध हो गये। उसके बाद मेरी तरफ देखकर लज्जित मुख से बोले, “मेरा जाना बहुत जरूरी है।”
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