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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने गर्दन हिलाकर सिर्फ इतना ही कहा, “मालूम है।” इससे ज्यादा और कुछ कहने को था भी नहीं। कारण, मैंने बहुत कुछ देखकर जान लिया है कि स्नेह की गहराई समय की स्वल्पता से हरगिज नहीं नापी जा सकती। और इस चीज की कवियों ने सिर्फ काव्यों के लिए ही शून्य कल्पना नहीं की- संसार में वास्तव में ऐसा हुआ करता है। इसीलिए, एक के जाने की आवश्यकता जितनी सत्य है, दूसरे का व्याकुल कण्ठ से मना करना भी ठीक उतना ही सत्य है या नहीं, इस विषय में मेरे मन में रंचमात्र भी संशय का उदय नहीं हुआ। मैं अत्यन्त सरलता से समझ गया कि इस बात को लेकर राजलक्ष्मी को शायद बहुत वेदना सहनी पड़ेगी।
साधुजी ने कहा, “मैं चल दिया। उधर का काम अगर निबट गया, तो शायद, फिर आऊँगा; मगर अभी यह बात जताने की जरूरत नहीं।”
मैंने स्वीकार करते हुए कहा, “सो सही है।”
साधुजी कुछ कहना ही चाहते थे कि घर की ओर देखकर सहसा एक गहरी उसाँस भरकर जरा मुसकराए; उसके बाद धीरे-से बोले, “अजीब देश है यह बंगाल! इसमें राह चलते माँ-बहिनें मिल जाती हैं, किसमें सामर्थ्य है कि इनसे बचकर निकल जाय?”
इतना कहकर साधुजी धीरे-धीरे बाहर चले गये।
उनकी बात सुनकर मैंने भी एक गहरी साँस ली। मालूम हुआ, बात असल में ठीक है। जिसे देश की समस्त माँ-बहिनों की वेदना ने खींचकर घर से बाहर निकाला है, उसे सिर्फ एक ही बहिन स्नेह, दही की मलाई और मछली का मूँड़ देकर कैसे पकड़े रख सकती है ।
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