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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी मेरे मुँह की ओर देखती रही, शायद ठीक से समझ न सकी। उसने फिर पूछा, “जाते वक्त वह क्या तुमसे कुछ कह गया है?”
मैंने गरदन हिलाकर कहा, “नहीं तो, ऐसी कोई बात नहीं कहीं।”
क्यों मैंने जरा-सा सत्य छिपाया, सो मैं खुद भी नहीं जानता। चलते समय साधु ने जो बात कही थी, वह अब तक मेरे कानों में ज्यों की त्यों गूँज रही थी। जाते समय वे कह गये थे, 'विचित्र देश है यह बंगाल! यहाँ राह-चलते माँ-बहिनें मिल जाती हैं- किसमें सामर्थ्य है जो इनसे बचकर निकल जाय!”
म्लान मुख से राजलक्ष्मी चुपचाप बैठी रही, मेरे मन में भी बहुत दिनों की बहुत-सी भूली हुईं घटनाएँ धीरे-धीरे झाँककर देखने लगीं। मैंने मन-ही-मन कहा, “ठीक है! ठीक है! साधुजी, तुम कोई भी क्यों न हो, इतनी कम उमर में ही तुमने अपने इस कंगाल देश को अच्छी तरह देख लिया है। नहीं तो, आज तुम इसके यथार्थ रूप की खबर इतनी आसानी से इतने कम शब्दों से नहीं दे सकते। जानता हूँ, बहुत दिनों की त्रुटियों और अनेक विच्युतियों ने हमारी मातृभूमि के सर्वांग में कीचड़ लेप दिया है, फिर जिसे इस सत्य की परीक्षा करने का अवसर मिला है, वह जानता है कि यह कितना बड़ा सत्य है।”
इसी तरह चुपचाप दस-पन्द्रह मिनट बीत जाने पर राजलक्ष्मी ने मुँह उठाकर कहा, “अगर यही उद्देश्य उसके मन में हो, तो मैं कहे देती हूँ कि किसी न किसी दिन उसे घर लौटना ही होगा। इस देश में एकमात्र पराया भला करने वालों की दुर्गति से शायद वह परिचित नहीं है। इसका स्वाद कुछ-कुछ मुझे मिल चुका है, मैं जानती हूँ। मेरी तरह एक दिन जब संशय बाधा और कटुवचनों से उसका सारा मन विरक्त रस से भर जायेगा, तब उसे भी वापस भागने को राह ढूँढे न मिलेगी।”
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