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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राजलक्ष्मी हँस दी, फिर करुण कण्ठ से बोली, “मालूम होता है आनन्द के घर सब कुछ मौजूद है, फिर भी उसने धर्म के लिए इसी उमर में सब छोड़ दिया है। मगर तुम तो ऐसा नहीं कर सके?”
मैंने कहा, “नहीं, और भविष्य में भी शायद न कर सकूँगा।”
राजलक्ष्मी ने कहा, “क्यों भला?”
मैंने कहा, इसका प्रधान कारण यह है कि जिसे छोड़ना चाहिए वह घर-गृहस्थी मेरे कहाँ है, और कैसी सो मैं नहीं जानता, और जिसके लिए छोड़ी जाय उस परमात्मा के लिए भी मुझे रंचमात्र लोभ नहीं। इतने दिन उसके बिना ही कट गये हैं, और बाकी दिन भी अटके न रहेंगे, मुझे इस बात का पूरा भरोसा है! दूसरी तरफ, तुम्हारे ये आनन्द भाई साहब गेरुआ वसन धारण करने पर भी ईश्वर-प्राप्ति के लिए ही निकल पड़े हों; ऐसा मैं नहीं समझता। कारण यह कि मैंने भी कई बार साधुओं का संग किया है, पर उनमें से किसी ने भी आज तक दवाओं की पेटी लादे घूमने को भगवत्-प्राप्ति का उपाय नहीं बताया है। इसके सिवा उनके खाने-पीने का हाल तो तुमने आँखों से देखा ही है।”
राजलक्ष्मी क्षण-भर चुप रहकर बोली, “तो क्या वह झूठमूठ को ही घर-गृहस्थी छोड़कर इतना कष्ट उठाने के लिए निकला है? सभी को क्या तुम अपने ही समान समझते हो?”
मैंने कहा, “नहीं तो, बड़ा भारी अन्तर है। वे भगवान की खोज में न निकलने पर भी, जिसके लिए निकले हैं वह उनके आसपास ही मालूम होता है, अर्थात् अपना देश। इसलिए उनका घर-द्वार छोड़ आना ठीक, घर-गृहस्थी छोड़ना नहीं है। साधुजी ने तो सिर्फ एक छोटी गृहस्थी छोड़कर बड़ी गृहस्थी में प्रवेश किया है।”
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