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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
परन्तु निवेदन समाप्त होने के पहले ही डोम का रुपया सुनते ही राजलक्ष्मी ने झटपट उसे नीचे रखकर कहा, “तो रहने दो, रहने दो, यह भी देने की जरूरत नहीं- तुम लोग ऐसे ही लड़की का ब्याह कर दो।”
इस भेंट लौटा देने के कारण लड़की का पिता और उससे भी अधिक रतन खुद बड़ी आफत में पड़ गया; वह नाना प्रकार से समझाने की कोशिश करने लगा कि इस राज-वरण के सम्मान के बिना मंजूर किये किसी तरह चल ही नहीं सकता। राजलक्ष्मी उस सुपारी समेत रुपये को क्यों नहीं लेना चाहती। इस बात को मैं कमरे के भीतर बैठे ही बैठे समझ गया था, और रतन किसलिए इतना अनुरोध कर रहा है, सो भी मुझसे छिपा न था। जहाँ तक सम्भव है दिया जानेवाला रुपया और भी ज्यादा पाने और गुमाश्ता कुशारी महाशय के हाथ से छुटकारा पाने के लिए ही यह कार्रवाई की गयी है; और रतन 'हुजूर' आदि सम्भाषण के बदले उनका मुखपात्र होकर अर्जी पेश करने आया है। वह काफी आश्वासन देकर उन्हें लाया होगा, इसमें तो कोई शक ही नहीं। उसका यह संकट अन्त में मैंने ही दूर किया। उठकर मैंने ही रुपया उठाया और कहा, “मैंने ले लिया, तुम घर जाकर ब्याह की तैयारियाँ करो।”
रतन का चेहरा मारे गर्व के चमक उठा, और राजलक्ष्मी ने अस्पृश्य के प्रति-ग्रह के दायित्व से छुटकारा पाकर सुख की साँस ली। वह खुश होकर बोली, “यह अच्छा ही हुआ, जिनका हक है खुद उन्हींने अपने हाथ से ले लिया।” यह कहकर वह हँस दी।
मधु डोम ने कृतज्ञता से भरकर हाथ जोड़कर कहा, “हुजूर पहर रात के भीतर ही लगन है, एक बार अगर हुजूर के पैरों की धूल गरीब के घर पड़ती...” इतना कहकर वह एक बार मेरे और एक बार राजलक्ष्मी के मुँह की ओर करुण दृष्टि से देखता रहा।
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