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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैं राजी हो गया, राजलक्ष्मी खुद भी जरा हँसकर नौबत की आवाज से अन्दाजा लगाकर बोली, “नहीं है न तुम्हारा घर मधु ? अच्छा, अगर समय मिला तो मैं भी जाकर एक बार देख आऊँगी।” रतन की तरफ देखकर बोली, “बड़ा सन्दूक खोलकर देख तो रे, मेरी नयी साड़ियाँ आई हैं कि नहीं? जा, लड़की को उनमें से एक दे आ। मिठाई शायद यहाँ मिलती न होगी, बताशे मिलते हैं? अच्छा, सो ही सही। कुछ वे ही लेते जाना। अच्छा हाँ, तुम्हारी लड़की की उमर क्या है मधु? वर कहाँ का रहने वाला है? कितने आदमी जीमेंगे? इस गाँव में किनते घर हैं तुम लोगों के?”
जमींदार-गृहिणी के एक साथ इतने प्रश्नों के उत्तर में मधु ने सम्मान और विनय के साथ जो कुछ कहा, उससे मालूम हुआ कि उसकी लड़की की उमर नौ साल के भीतर ही है, वर युवक है, उमर तीस-चालीस से ज्यादा न होगी, वह चार-पाँच कोस उत्तर की तरफ किसी गाँव में रहता है- वहाँ उसके समाज का एक बड़ा हिस्सा रहता है, वहाँ जातीय पेशा कोई नहीं करता-सभी लोग खेती-बारी करते हैं- लड़की खूब सुख से रहेगी- डर है तो सिर्फ आज की रात का। कारण बारातियों की तादाद कितनी होगी और वे कहाँ क्या फसाद कर बैठेंगे, सो बिना सबेरा हुए कुछ कहा नहीं जा सकता। सभी कोई पैसे वाले ठहरे-कैसे उनकी मान-मर्यादा कायम रखकर शुभ-कार्य सम्पन्न होगा, इसी चिन्ता में बेचारा सूख के काँटा हुआ जा रहा है। इन सब बातों का विस्तार के साथ वर्णन करके अन्त में उसने कातरता के साथ निवेदन किया कि चिउड़ा, गुड़ और दही का इन्तजाम हो गया है, यहाँ तक कि आखिर में दो-दो बड़े बताशे भी पत्तलों में परोसे जाँयगे; मगर फिर भी अगर कोई गड़बड़ी हुई तो हम लोगों को रक्षा करनी होगी।
राजलक्ष्मी ने कुतूहल के साथ ढाँढ़स देकर कहा, “गड़बड़ी कुछ न होने पायगी मधु, तुम्हारी लड़की का ब्याह निर्विध्न हो जायेगा, मैं आशीर्वाद देती हूँ। तुमने खाने-पीने की इतनी चीजें इकट्ठी की हैं कि तुम्हारे समधी के साथी लोग खा-पीकर खुशी-खुशी घर जाँयगे।”
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