लोगों की राय

उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


मैं घबराया हुआ बाहर आया और राजलक्ष्मी भी आश्चर्य के साथ उठकर मेरे पास आकर खड़ी हो गयी। देखा कि सब मिलकर एक साथ सम-स्वर में नालिश करना चाहते हैं। रतन के बार-बार डाँटने पर भी अन्ततोगत्वा कोई भी चुप न रह सका। कुछ भी हो, मामला समझ में आ गया। कन्यादान स्थगित हुआ पड़ा है; कारण, मन्त्रपाठ में गलती होने की वजह से वर पक्ष के पुरोहित ने कन्या पक्ष के पुरोहित के पुष्प-जल आदि उठाकर फेंक दिए हैं और उसका मुँह दबा रखा है। वास्तव में, यह बड़ा अत्याचार है। पुरोहित-सम्प्रदाय बहुत-से कीर्ति के काम किया करता है, परन्तु ऐसा मैंने कभी नहीं सुना कि दूसरे गाँव के आकर जबरदस्ती अपने ही एक सम-व्यवसायी की पूजा की सामग्री फेंक दी गयी हो और शारीरिक बल-प्रयोग से उसका मुँह दबाकर स्वाधीन और सजीव मन्त्रोच्चारण में बाधा पहुँचाई गयी हो। यह तो सरासर अत्याचार है!

राजलक्ष्मी क्या कहे, सहसा सोचकर कुछ तय न कर पाई। मगर रतन घर में जाने क्या कर रहा था, उसने बाहर निकलकर जोर से गरजकर कहा, “तुम लोगों के यहाँ पुरोहित कैसा रे?” यहाँ अर्थात् जमींदारी में आकर रतन गाँववालों से तू तड़ाक और 'रे' करके बात करने लगा, क्योंकि उसकी निगाह में इससे अधिक सम्मान के लायक यहाँ कोई है ही नहीं। बोला, “डोम चमारों का कोई ब्याह में ब्याह है, जो पुरोहित चाहिए? यह क्या कोई ब्राह्मण-कायस्थों के यहाँ का ब्याह है जो पढ़ाने के लिए ब्राह्मण पुरोहित आयँगे?” यह कहकर वह बार-बार मेरे और राजलक्ष्मी के मुँह की ओर गर्व के साथ देखने लगा। यहाँ इस बात की याद दिला देनी चाहिए कि रतन खुद जात का नाई है।

मधु डोम खुद नहीं आ सका था- वह कन्यादान के लिए बैठ चुका था, पर उसका सम्बन्धी आया था। उस आदमी ने जो कुछ कहा उससे मालूम हुआ कि यद्यपि उन लोगों में ब्राह्मण नहीं आते, वे खुद ही अपने 'पुरोहित' हैं, तथापि, राखाल पण्डित उनके लिए ब्राह्मण के ही समान है। कारण, उसके गले में जनेऊ है और वही उनके दसों कर्म कराता है। यहाँ तक कि वह इन लोगों के हाथ का पानी तक नहीं पीता। लिहाजा, इतनी जबरदस्त सात्वि‍कता के बाद, अब कोई प्रतिवाद नहीं चल सकता। अतएव, असली और खालिस ब्राह्मण में इसके बाद भी अगर कोई प्रभेद रह गया हो, तो वह बहुत ही मामूली-सा होगा।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book