|
उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
||||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
खैर, कुछ भी हो, इनकी व्याकुलता और पास ही ब्याह वाले घर की प्रबल चीत्कार से मुझे वहाँ जाना ही पड़ा। राजलक्ष्मी से मैंने कहा, “तुम भी चलो न, घर में अकेली रहकर क्या करोगी?”
राजलक्ष्मी ने पहले तो सिर हिलाया, पर अन्त में वह अपने कुतूहल को न रोक सकी और 'चलो' कहके मेरे साथ हो ली। वहाँ पहुँचकर देखा कि मधु के सम्बन्धी ने बिल्कुल अत्युक्ति नहीं की है। झगड़ा भयंकर रूप धारण करता जा रहा है। एक तरफ वर पक्ष के करीब तीस-बत्तीस आदमी हैं और दूसरी ओर कन्या पक्ष के भी लगभग उतने ही होंगे। बीच में प्रबल और स्थूलकाय शिबू पण्डित दुर्बल और क्षीणजीवी राखाल पण्डित के हाथ पकड़े खड़ा है। हम लोगों को देखकर वह हाथ छोड़कर अलग हटके खड़ा हो गया। हम लोगों ने सम्मान के साथ एक चटाई पर बैठने के बाद शिबू पण्डित से इस अतर्कित आक्रमण का हेतु पूछा, तो उसने कहा, “हुजूर, मन्तर का 'म' तो जानता नहीं यह बेटा और फिर भी अपने को कहता है, पण्डित हूँ! आज तो यह ब्याह ही की रेढ़ मार देता!” राखाल ने मुँह बिचकाकर प्रतिवाद किया, “हाँ, सो तो देता ही! पाँच-पाँच सराधा ब्याह करा रहा हूँ, और फिर भी मैं नहीं जानता मन्तर!”
मन में सोचने लगा, अरे, यहाँ भी वही मन्त्र है। घर में तो माना कि राजलक्ष्मी के सामने मौन रहकर ही तर्क का जवाब दे दिया जाता है, मगर, यहाँ अगर वास्तव में मध्यस्थता करनी पड़े तो आफत में फँस जाऊँगा! अन्त में बहुत वाद-वितण्डा के बाद तय हुआ कि राखाल पण्डित ही मन्त्र पढ़ेगा- हाँ, अगर कहीं कुछ गलती होगी तो उसे शिबू के लिए आसन छोड़ देना पड़ेगा। राखाल राजी होकर पुरोहित के आसन पर जा बैठा। कन्या के पिता के हाथ में कुछ फूल देकर और वर-कन्या के दोनों हाथ एकत्र मिलाकर उसने जिन वैदिक मन्त्रों का पाठ किया, वे मुझे अब तक याद हैं। वे सजीव हैं या नहीं, सो मैं नहीं जानता, मगर मन्त्रों के विषय में कोई ज्ञान न होने पर भी मुझे सन्देह है कि ऋषिगण वेद में ठीक ये ही शब्द न छोड़ गये होंगे।
|
|||||

i 









