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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
शिबू ने कहा, “मधु, अबकी बार तुम कहो, “भगवती डोमाय पुत्राय सम्प्रदानं नम:।”
कन्या के साथ मधु ने भी इसे दुहरा दिया। सभी कोई नीरव स्थिर थे। दृश्य देखकर मालूम हुआ कि शिबू के समान शास्त्रज्ञ व्यक्ति ने इसके पहले कभी इस प्रान्त में पदार्पण ही नहीं किया था।
शिबू ने वर के हाथ में फूल देकर कहा, “विपिन, तुम कहो, 'जितने दिन जीवनं उतने दिन भात-कपड़ा प्रदानं स्वाहा'।”
विपिन ने रुक-रुककर बहुत कष्ट से और बहुत देर से यह मन्त्र उच्चारण किया।
शिबू ने कहा, “वर कन्या दोनों मिलकर कहो, 'युगलमिलनं नम:'।”
वर और कन्या की तरफ से मधु ने इसे दुहरा दिया। इसके बाद प्रबल हरि-ध्वनि के साथ वर-वधू को घर के भीतर गोद में उठाकर ले जाया गया। मेरे चारों तरफ एक गूँज-सी उठ खड़ी हुई। सभी एक वाक्य से स्वीकार करने लगे कि 'हाँ, आदमी है तो शास्त्र का पूरा जानकार! मन्तर-सा मन्तर पढ़ा! राखाल पण्डित अब तक हम लोगों को धोखा देकर ही खा-पी रहा था।'
मैं जितनी देर वहाँ रहा, बराबर गम्भीर होकर बैठा रहा, और अन्त तक उसी गम्भीरता को कायम रखता हुआ राजलक्ष्मी का हाथ पकड़कर घर लौट आया। मैं नहीं जानता कि वहाँ वह अपने पर काबू रख चुपचाप कैसे बैठी रही, मगर घर के आते ही उसने अपनी हँसी के प्रवाह को इस तरह छोड़ दिया कि दम घुटने की नौबत आ पहुँची। बिस्तर पर लोट-पोट होकर वह बार-बार यही कहने लगी, “हाँ, एक सच्चा महामहोपाध्याय देखा! राखाल तो अब तक उन्हें यों ही ठगता-खाता था।”
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