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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
राखाल पण्डित वर से कहा, “बोलो, 'मधुडोमाय कन्याय नम:'।”
वर ने दुहराया, “मधुडोमाय कन्याय नम:।”
राखाल ने कन्या से यहा, “बोलो, 'भगवती डोमाय पुत्राय नम:'।”
बालिका वधू के उच्चारण में कहीं त्रुटि न रह जाय, इस खयाल से मधु उसकी तरफ से उच्चारण करना ही चाहता था कि इतने में शिबू पण्डित दोनों हाथ ऊपर को उठाकर वज्र-सा गरजता और सबको चौंकाता हुआ बोल उठा, “यह मन्तर है ही नहीं! यह ब्याह ही नहीं हुआ!” पीछे से कपड़ा खींचे जाने पर मैंने मुँह फेरकर देखा कि राजलक्ष्मी मुँह में आँचल दबाकर जी-जान से हँसी रोकने की कोशिश कर रही है और उपस्थित लोग अत्यन्त उद्विग्न हो उठे हैं। राखाल पण्डित ने लज्जित मुख से कुछ कहना भी चाहा, मगर उसकी बात पर किसी ने ध्याँन ही न दिया, सभी कोई एक स्वर में शिबू से विनय करने लगे, “पण्डितजी, मन्तर आप ही पढ़वा दीजिए, नहीं तो यह ब्याह ही न होगा- सब मिट्टी हो जायेगा। चौथाई दच्छिना उनको देकर बाकी बारह आना आप ही ले लीजिएगा, पण्डितजी।”
शिबू पण्डित ने तब उदासीनता दिखलाते हुए कहा, “इसमें राखाल का कोई दोष नहीं, इधर असल मन्तर मेरे सिवा और कोई जानता ही नहीं है। ज्यादा दक्षिणा मैं नहीं चाहता। मैं यहाँ से मन्त्र पढ़ दूँगा, राखाल उनसे पढ़वा दे।” यह कहकर वह शास्त्रज्ञ पुरोहित मन्त्रोच्चारण करने लगा और पराजित राखाल निरीह भलेमानस की तरह वर-कन्या से आवृत्ति कराने लगा।
शिबू ने कहा, “बोलो, 'मधुडोमाय कन्याय भुज्यपत्रं नम:'।”
वर ने दुहराया , “मधुडोमाय कन्याय भुज्यपत्रं नम:।”
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