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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
पन्द्रह-सोलह वर्ष का एक सुन्दर और सबलकाय लड़का आँगन के एक तरफ खड़ा-खड़ा गम्भीर मनोयोग के साथ हमारी बातें सुन रहा था। कुशारी महाशय की उस पर निगाह पड़ते ही वे कह उठे, “बेटा हरी, नारायण का नैवेद्य शायद अब तक तैयार हो गया होगा, एक बार जाकर भोग तो दे आओ बेटा। बाकी पूजा-आह्निक खतम करने में मुझे देर न लगेगी।” फिर मेरी तरफ देखकर बोले, “आज झूठमूठ को आप लोगों को कष्ट दिया- बड़ी अबेर हो गयी।” कहते हुए, मेरे उत्तर की प्रतीक्षा बिना किये ही, पलक मारने के साथ खुद ही अदृश्य हो गये।
अब यथासमय, अर्थात् यथासमय के बहुत देर बाद, हमारे मध्याह्न-भोजन के लिए जगह ठीक करने की खबर आयी। जान में जान आयी। सिर्फ ज्यादा देर हो जाने के कारण नहीं, बल्कि अब आगन्तुकों के प्रश्न-वाणों का अन्त समझकर ही सुख की साँस ली। वे, भोजन की तैयारी होती देख, कम-से-कम कुछ देर के लिए, मुझे छुटकारा देकर अपने-अपने घर चले गये। मगर खाने बैठा मैं अकेला ही। कुशारी महाशय मेरे साथ न बैठे बल्कि सामने आकर बैठ गये। इसका कारण उन्होंने विनय और गौरव के साथ स्वयं ही व्यक्त किया। उपवीत धारण करने के दिन से लेकर आज तक भोजन-समय वे मौन ही रहते आए हैं, उस व्रत को आज तक भंग नहीं होने दिया; लिहाजा इस काम को वे अब भी अकेले ही एकान्त कोठरी में सम्पन्न किया करते हैं। मैंने भी कोई आपत्ति नहीं की। आज उसके भी कोई व्रत है और आज वह परान्न ग्रहण न करेगी, तब भी मुझे आश्चर्य न हुआ, परन्तु इस छल के कारण मैं मन-ही-मन क्षुब्ध हो उठा और इसकी क्या जरूरत थी, यह भी न समझ सका। परन्तु राजलक्ष्मी ने मेरे मन की बात फौरन ताड़ते हुए कहा, “इसके लिए तुम रंज मत करो, अच्छी तरह खा लो। मैं आज नहीं खाऊँगी, ये लोग सभी जानते हैं।”
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