लोगों की राय

उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

337 पाठक हैं

शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


मैंने कहा, “और, मैं ही नहीं जानता। लेकिन, अगर यही बात थी तो तकलीफ उठाकर यहाँ तक आने की क्या जरूरत थी?”

इसका जवाब राजलक्ष्मी ने नहीं दिया, बल्कि कुशारी-गृहिणी ने दिया। वे बोलीं, “यह तकलीफ मैंने ही मन्जूर कारवाई है बेटा। ये यहाँ न खायँगी सो मैं जानती थी; फिर भी जिनकी कृपा से हमारा पेट पलता है, उनके पाँवों की धूल घर में पड़े, इस लोभ को मैं नहीं सँभाल सकी। क्यों बेटी, है न ठीक?” यह कहकर उन्होंने राजलक्ष्मी के मुँह की तरफ देखा। राजलक्ष्मी ने कहा, “इसका जवाब आज न दूँगी माँ, और किसी दिन दूँगी।” यों कहकर वह हँसने लगी।

परन्तु मैं अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर कुशारी-गृहिणी के मुँह की ओर देखने लगा। गँवई-गाँव में, खासकर ऐसे सुदूर गाँव में, किसी स्त्री के मुँह से इस तरह की सहज-सुन्दर स्वाभाविक बातें सुनने की मैंने कल्पना भी न की थी। और कभी स्वप्न में यह बात भी न सोची थी अब भी, इस गँवई-गाँव में भी, इससे बढ़कर एक और बहुत आश्चर्यजनक नारी का परिचय मिलना बाकी है। मेरे भोजन परोसने का भार अपनी विधवा कन्या पर सौंपकर कुशारी-गृहिणी पंखा हाथ में लिये मेरे सामने आकर बैठी थीं। शायद उमर में मुझसे बहुत बड़ी होने के कारण ही माथे पर पल्ले के सिवा उनके मुँह पर किसी तरह का परदा नहीं था। वह सुन्दर था या असुन्दर, मुझे कुछ मालूम नहीं, सिर्फ इतना ही मालूम हुआ कि वह साधारण भारतीय माता के समान स्नेह और करुणा से परिपूर्ण था। दरवाजे के पास कुशारीजी खड़े थे, बाहर से, उनकी लड़की ने पुकार कर कहा, “बाबूजी, तुम्हारे लिए थाली परोस दी है।” अबेर बहुत हो चुकी थी, और इसी खबर के लिए ही शायद वे साग्रह प्रतीक्षा कर रहे थे, फिर भी, एक बार बाहर और एक बार मेरी तरफ देखते हुए बोले, “अभी जरा ठहर जा बिटिया, इनको जीम लेने दे।”

गृहिणी ने उसी दम बाधा देते हुए कहा, “नहीं, तुम जाओ, झूठमूठ को अन्न मत बिगाड़ो। ठण्डा हो जाने पर तुम नहीं खा सकोगे, मैं जानती हूँ।”

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book