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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
कुशारीजी को संकोच हो रहा था, बोले, “बिगड़ेगा क्या- ये जीम चुकें, बस।”
गृहिणी ने कहा, “मेरे रहते भी अगर खिलाने में कसर रह जायेगी तो तुम्हारे खड़े रहने पर भी वह पूरी नहीं हो सकेगी। तुम जाओ- क्यों बेटा, ठीक है न? यह कहती हुई वे मेरी ओर देखकर हँसीं। मैंने भी हँसते हुए कहा, “बल्कि और कमी रह जायेगी। आप जाइए कुशारीजी, ऐसे भूखे खड़े देखते रहने से दोनों में से किसी को भी फायदा न होगा।” इस पर वे और कुछ न कहकर धीरे से चले गये, परन्तु मालूम हुआ, वे सम्मानित अतिथि के भोजन के समय पास न रहने के संकोच को साथ ही लेते गये। लेकिन, कुछ ही देर बाद मुझसे यह छिपा न रहा कि वह मेरी जबरदस्त भूल थी। उनके चले जाने पर उनकी गृहिणी ने कहा, “निरामिष अरवा चावल का भात खाते हैं; ठण्डा हो जाने पर फिर खा नहीं सकते, इसी से जबरदस्ती भेज दिया है। लेकिन यह भी एक बात है बेटा, कि जो अन्नदाता हैं, उनसे पहले अपने मुँह में अन्न देना बड़ा कठिन है।”
उनकी इस बात से मन-ही-मन मुझे शर्म मालूम होने लगी, मैंने कहा, “अन्नदाता मैं नहीं हूँ। और, अगर यह सच भी हो, तो वह इतना कम है कि छूट जाय तो शायद आपको मालूम भी न हो।”
कुशारी-गृहिणी कुछ देर तक चुप रहीं। मालूम हुआ कि उनका चेहरा धीरे-धीरे अत्यन्त म्लान-सा हो गया। उसके बाद वे बोलीं, “तुम्हारी बात बिल्कुल झूठ नहीं बेटा, भगवान ने हमें कुछ कम नहीं दिया है, पर अब मालूम होता है कि इतना अगर वे न भी देते तो, शायद, इससे उनकी ज्यादा दया ही प्रकट होती। घर में यही तो एक विधवा लड़की है- क्या होगा हमारे इन भर-भर कोठी धानों का, भर-कढ़ाई दूध और गुड़ की गागरों का? इन सबको भोगने वाले जो थे वे तो हमें छोड़कर ही चले गये।”
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