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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मुझे जमींदार समझकर यदि कोई मिलने आता तो मैं भीतर-ही-भीतर जैसे लज्जित होता था वैसे ही झुँझला भी उठता था। खासकर ये लोग ऐसी-ऐसी प्रार्थनाएँ और शिकायतें लाया करते हैं, और ऐसे-ऐसे बद्धमूल उत्पातों और अत्याचारों का प्रतिकार चाहते हैं कि जिन पर हमारा कोई काबू ही नहीं चलता। यही कारण है कि इन महाशय पर भी मैं प्रसन्न न हो सका। मैंने कहा, “देर से आने के कारण आप दु:खित न हों; कारण, बिल्कुल ही न आते तो भी मैं आपकी तरफ से कुछ खयाल न करता- ऐसा मेरा स्वभाव ही नहीं। मगर आपको जरूरत क्या है?”
ब्राह्मण ने लज्जित होकर कहा, “असमय में आकर शायद आपके काम में विघ्न पहुँचाया है, मैं फिर किसी दिन आऊँगा।” यह कहते हुए वे उठ खड़े हुए।
मैंने झुँझलाकर कहा, “मुझसे आपको काम क्या था, बताइए तो सही?”
मेरी नाराजगी को वे आसानी से ताड़ गये। जरा मौन रहकर शान्त भाव से बोले, “मैं मामूली आदमी हूँ, जरूरत भी मामूली-सी है। माँजी ने मुझे याद किया था, शायद उन्हें जरूरत हो- मुझे चाहिए तो कुछ नहीं।”
जवाब कठोर था, पर था सत्य। और मेरे प्रश्न के देखते हुए असंगत भी न था। पर यहाँ आने के बाद से ऐसा जवाब सुनाने वाला कोई आदमी ही नहीं मिला, इसी से ब्राह्मण के उत्तर से सिर्फ आश्चर्य ही नहीं हुआ बल्कि क्रोध भी आ गया। यों मेरा मिजाज रूखा नहीं है और कहीं होता तो शायद कुछ खयाल भी न करता; परन्तु ऐश्वर्य की क्षमता इतनी भद्दी चीज है कि दूसरे से उधार ली हुई होने पर भी उसके अपव्यवहार प्रलोभन को आदमी आसानी से नहीं टाल सकता। अतएव, अपेक्षाकृत बहुत ही ज्यादा रूढ़ उत्तर मेरी जबान पर आ गया, परन्तु उसकी तेजी निकलने के पहले ही देखा कि बगल का दरवाजा खुल गया है और राजलक्ष्मी अपना पूजा-पाठ अधूरा छोड़कर उठ आई है। वह दूसरे बड़े विनय के साथ प्रणाम करके बोली, “अभी से मत चले जाइए, बैठिए आप। आपसे मुझे अभी बहुत-सी बातें करनी हैं।”
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