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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
ब्राह्मण ने पुन: आसन ग्रहण किया और कहा, “माँजी, आपने तो मेरे घर की बहुत दिनों की दुश्चिन्ता दूर कर दी, उससे तो हम लोगों की लगभग पन्द्रह दिन की गुजर चल जायेगी। पर अभी तो कोई समय नहीं है, व्रत-नियम-पर्व कुछ भी तो नहीं है। ब्राह्मणी आश्चर्य में आकर यही पूछ रही थी...”
राजलक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, “आपकी ब्राह्मणी ने सिर्फ व्रत-नियमों के ही दिन-वार सीख रखे हैं, मगर पड़ोसियों की भेंट-सौगात लेने के दिन-वार का विचार वे अभी मुझसे सीख जाँय, कह दीजिएगा।”
ब्राह्मण ने कहा, “तो इतना बड़ा सीधा क्या...”
प्रश्न को वे खतम न कर सके, या फिर उन्होंने जान-बूझकर ही नहीं करना चाहा, परन्तु मैंने इस दाम्भिक ब्राह्मण के अनुक्त वाक्य का मर्म सम्पूर्ण रूप से हृदयंगम कर लिया। फिर भी भय हुआ कि कहीं मेरी ही तरह बिना समझे राजलक्ष्मी को भी कोई कड़ी बात न सुननी पड़े। इस आदमी का एक तरफ का परिचय अभी तक अज्ञात रहने पर भी दूसरी तरफ का परिचय पहले ही मिल चुका था, लिहाजा ऐसी इच्छा न हुई कि मेरे सामने फिर उसकी पुनरावृत्ति हो। साहस की बात सिर्फ इतनी ही थी कि राजलक्ष्मी को कभी कोई आमने-सामने निरुत्तर नहीं कर सकता था। ठीक हुआ भी यही। इस असुहावने प्रश्न से भी वह बाल-बाल बचकर साफ निकल गयी, बोली, “तर्कालंकार महाशय, सुना है आपकी ब्राह्मणी बहुत ही गुस्सैल हैं- बिना निमन्त्रण के पहुँच जाने से शायद खफा हो जाँयगी। नहीं तो मैं इस बात का जवाब उन्हें ही जाकर दे आती।”
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