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मूछोंवाली

मधुकान्त

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9835
आईएसबीएन :9781613016039

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‘मूंछोंवाली’ में वर्तमान से दो दशक पूर्व तथा दो दशक बाद के 40 वर्ष के कालखण्ड में महिलाओं में होने वाले परिवर्तन को प्रतिबिंबित करती हैं ये लघुकथाएं।

15

अनहोनी


भाभी के गुजर जाने के बाद दयाशंकर अपने भाई की अनाथ व अपंग लड़की धीरा को अपने साथ ले आया परन्तु उनकी पत्नी रीना को वह फूटी आंख भी न सुहाई। अपंग होने के बावजूद धीरा सारा दिन अपनी चाची के काम में हाथ बटाती, रात को जो कुछ रूखा-सूखा मिल जाता खा-पीकर सो जाती।

रीना को यह भय था कि एक अपंग लड़की के घर में आने से उसके घर की खुशियां बिखर जाएंगी। रात को रीना बिखर गयी-’पूरा एक महिना हो गया। आप मेरी बात पर ध्यान नहीं देते। जिस दिन कोई अनहोनी हो जायेगी तब आपकी आंख खुलेगी। कल सण्डे है, इसको किसी अनाथालय में छोड़ आओ...।’

‘बिना माँ-बाप की अपाहिज और वह भी लड़की... किसके सहारे छोड़ आऊं...।’ दुःखी मन से वह अनाथालय के विषय में सोचने लगा।

सुबह सवेरे रीना के कोहराम ने घर को सिर पर उठा लिया। ‘मैं कहती थी कुछ अनहोनी होकर रहेगी... हाय मेरा सारा गहना-कपड़ा चुरा ले गयी लंगड़ी...।’

दयाशंकर ने देखा अलमारी खुली पड़ी थी, कमरे में सारा सामान बिखरा पड़ा था... रीना की बात न मानकर वह भी पछता रहा था।

‘कुछ भी तो नहीं छोड़ा कलमूंही ने... हाय राम... चलो उसके कमरे में देखते हैं, क्या-क्या चुरा कर ले गयी...।’दयाशंकर भी पीछे-पीछे चल पड़ा।

दरवाजा खोलकर देखा तो उसमें सारे गहने कपड़े बिखरे पड़े थे, ‘सब लेकर भागने की तैयारी थी पर कुछ भी ले जाने का मौका न लगा... चलो बिना कुछ लिए चली गयी... पीछा छूटा...।’

दयाशंकर इस घटना के तार जोड़ने में ही उलझा था, तभी रीना ने पीछे मुड़कर देखा... धीरा दरवाजे के पास मरी पड़ी थी। उसके पेट में गोली मारी गयी थी।

एक क्षण में दयाशंकर ने इस घटना के सभी तार जोड़ लिए।


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