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मूछोंवाली

मधुकान्त

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :149
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9835
आईएसबीएन :9781613016039

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‘मूंछोंवाली’ में वर्तमान से दो दशक पूर्व तथा दो दशक बाद के 40 वर्ष के कालखण्ड में महिलाओं में होने वाले परिवर्तन को प्रतिबिंबित करती हैं ये लघुकथाएं।

55

सामण की कौथली


‘बहन कलावती राम राम’

‘राम राम भाई... तेरी सौ बार राम राम’

‘काल रमेश नै भेजूंगा सामण की कौथली...।’

‘भाई मेरी एक बात ध्यान से सुण ले। जमाने का हिसाब लगाकर ये पुराने रीवाज छोड़ दे... न तो आजकल बालकां न फुर्सत और ना बाहण-बेटियों न लालच... सारे ठाठ सै। भाई तेरी तो आन-जान की हिम्मत नहीं, मौका लगाकै मैं तेरे तै मिलण आ जाऊंगी...।’

‘बाहण बात तो तेरी स्याणी सै इसा सै बड़ा नै रीत बणा राखी सै... जिब तक निभ जा ठीक सै...।’

‘बोहत निभा ली भाई। चार बुआ और दो बाहण... एक छोरा तेरा किस किस की कौथली दे कै आवेगा। जिसकै धणा जरूरी हो चला जावेगा... बस...।’

‘अच्छा बाहण तेरी मरजी...।’

एक पुरानी परम्परा को बदलकर कलावती का मन संतोष से भर गया।


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