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उपन्यास >> चंद्रकान्ता

चंद्रकान्ता

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :272
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8395
आईएसबीएन :978-1-61301-007-5

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चंद्रकान्ता पुस्तक का ई-संस्करण

ग्यारहवां बयान

कुमार का मिजाज़ बदल गया। वे बातें जो उनमें पहले थीं, अब बिल्कुल न रहीं। मां-बाप की फिक्र, विजयगढ़ का खयाल, लड़ाई की धुन, तेजसिंह की दोस्ती, चन्द्रकान्ता और चपला के मरते ही सब जाती रहीं। किले से ये तीनों बाहर आये, आगे शिवदत्त की गठरी लिये देवीसिंह उनके पीछे कुमार को बीच में लिये तेजसिंह चले जाते थे। कुंवर वीरेन्द्रसिंह को इसका कुछ भी खयाल न था कि वे कहां जा रहे हैं। दिन चढ़ते-चढ़ते वे लोग बहुत दूर एक घने जंगल में जा पहुंचे जहां तेजसिंह के कहने से देवीसिंह ने महाराज शिवदत्त की गठरी जमीन पर रख दी और अपनी चादर से एक पत्थर खूब झाड़कर कुमार को बैठने के लिए कहा, मगर वे खड़े ही रहे, सिवाय जमीन देखने के कुछ भी न बोले।

कुमार की ऐसी दशा देखकर तेजसिंह बहुत घबराये। जी में सोचने लगे कि अब इनकी जिन्दगी कैसे रहेगी? अजब हालत हो रही है, चेहरे पर मुर्दानी छा रही है, तन-बदन की सुध नहीं, बल्कि पल्कें नीचे को बिल्कुल नहीं गिरतीं, आंखों की पुतलियां जमीन देख रही हैं, जरा भी इधर-उधर नहीं हटतीं। यह क्या हो गया? क्या चन्द्रकान्ता के साथ इनका भी दम निकल गया! यह खड़े क्यों हैं? तेजसिंह ने कुमार का हाथ पकड़ बैठाने के लिए जोर दिया, मगर घुटना बिल्कुल न मुड़ा, धम्म से ज़मीन पर गिर पड़े, सिर फूट गया, खून निकलने लगा मगर पलकें उसी तरह खुली-की-खुली, पुतलियां ठहरी हुई, सांस रुक-रुककर निकलने लगी।

अब तो तेजसिंह कुमार की जिन्दगी से बिल्कुल नाउम्मीद हो गये, रोकने से तबीयत न रुकी, ज़ोर से पुकार-पुकार कर रोने लगे। इस हालत को देख देवीसिंह की भी छाती फटी, रोने में तेजसिंह के शरीक हुए। तेजसिंह पुकार-पुकार कहने लगे कि–‘हाय कुमार, क्या सचमुच अब तुमने दुनिया छोड़ ही दी? हाय, न मालूम वह कौन-सी बुरी सायत थी कि कुमारी चन्द्रकान्ता की मुहब्बत तुम्हारे दिल में पैदा हुई जिसका नतीजा ऐसा बुरा हुआ, अब मालूम हुआ कि तुम्हारी ज़िन्दगी इतनी ही थी।’ तेजसिंह इस तरह बातें कर रहे थे कि एक तरफ से आवाज़ आई-

‘‘नहीं, कुमार की उम्र कम नहीं है, बहुत बड़ी है। इनको मारने वाला कोई पैदा नहीं हुआ। कुमारी चन्द्रकान्ता की मुहब्बत बुरी सायत में नहीं हुई बल्कि बहुत अच्छी सायत में हुई, इसका नतीजा बहुत अच्छा होगा। कुमार से शादी तो होगी ही, साथ ही इसके चुनार की गद्दी भी कुंवर वीरेन्द्रसिंह को मिलेगी, बल्कि और भी कई राज्य इनके हाथ से फतह होंगे। बड़े तेजस्वी और इनसे भी ज़्यादानाम पैदा करने वाले दो वीर पुत्र चन्द्रकान्ता के गर्भ से पैदा होंगे। क्या हुआ है जो रो रहे हो!’’

तेजसिंह और देवीसिंह का रोना एकदम बन्द हो गया, इधर-उधर देखने लगे। तेजसिंह सोचने लगे कि हैं, यह कौन है, ऐसी मुर्दे को जिलाने वाली आवाज़ किसके मुंह से निकली? क्या कहा! कुमार को मारने वाला कौन है? कुमार के दो पुत्र होंगे! यह कैसी बात है! तेजसिंह और देवीसिंह इधर उधर देखने लगे पर कहीं कुछ पता न चला। फिर आवाज़ आई, ‘‘इधर देखो।’’ आवाज़ की सीध पर एक तरफ सिर उठाकर तेजसिंह ने देखा कि पेड़ पर से जगन्नाथ ज्योतिषी नीचे उतर रहे हैं।

जगन्नाथ ज्योतिषी उतर के तेजसिंह के सामने आये और बोले, ‘‘आप हैरान मत होइए, ये सब बातें सच होने वाली हैं! मैंने ही कही हैं! इसके सोचने की भी ज़रूरत नहीं कि मैं महाराज शिवदत्त का तरफदार होकर आपके हित की बातें क्यों कहने लगा! इसका सबब भी थोड़ी देर में मालूम हो जायेगा और आप मुझको अपना सच्चा दोस्त समझने लगेंगे, पहले कुमार की फिक्र कर लें तब आपसे बातचीत हो!’’

इसके बाद जगन्नाथ ज्योतिषी ने तेजसिंह और देवीसिंह के देखते-देखते एक बूटी जिस पर तिकोनी पत्तियां और आसमानी रंग का फूल लगा हुआ था, डण्ठल का रंग बिल्कुल सफेद और खुरदुरा था, उसी जगह पास ही से ढूंढ़कर तोड़ी और हाथ में खूब मल के दो-दो बूंद उसके रस की कुमार की दोनों आंखों और कानों में टपका दीं, बाकी जो सीठी बची उसको तालू पर रख अपनी चादर से एक टुकड़ा फाड़ कर बांध दिया और बैठकर कुमार के ठीक होने की राह देखने लगे।

आधी घड़ी भी न बीतने पाई थी कि कुमार की आंखों का रंग बदल गया, पलकों ने गिरकर कौड़ियों को ढांक लिया, धीरे-धीरे हाथ-पैर भी हिलने लगे, दो-तीन छींके भी आईं जिसके साथ ही कुमार होश में आकर उठ बैठे। सामने ज्योतिषीजी के साथ तेजसिंह और देवीसिंह को बैठे देखकर पूछा, क्यों, मुझको क्या हो गया था! तेजसिंह ने सब हाल कहा। कुमार ने जगन्नाथ ज्योतिषी को दण्डवत किया और कहा, ‘‘महाराज, आपने मेरे ऊपर क्यों कृपा की? इसका हाल जल्द कहिए, मुझको कई तरह के शक हो रहे हैं!’’

ज्योतिषी जी ने कहा, ‘‘कुमार, यह ईश्वर की माया है कि आपके साथ रहने को मेरा जी चाहता है। महाराज शिवदत्त इस लायक नहीं हैं कि मैं उनके साथ रहकर अपनी जान दूं। उसको आदमी की पहचान नहीं है, वह गुणियों का आदर नहीं करता, उसके साथ रहना अपने गुण की मिट्टी खराब करना है। गुणी के गुण को देखकर कभी तारीफ नहीं करता। वह बड़ा भारी मतलबी है। अगर उसका काम किसी से कुछ बिगड़ जाये तो उसकी आंखें उसकी तरफ से तुरन्त बदल जाती हैं, चाहे वह कैसा ही गुणी क्यों न हो। सिवाय इसके वह अधर्मी से भी बड़ा भारी है, कोई भला आदमी ऐसे के साथ रहना पसन्द नहीं करेगा, इसी से मेरा जी फट गया। मैं अगर रहूंगा तो आपके साथ रहूंगा। आप-सा कदरदान मुझको कोई दिखाई नहीं देता। मैं कई दिनों से इस फिक्र में था मगर कोई ऐसा मौका नहीं मिलता था कि अपनी सच्चाई दिखाकर आपका साथी हो जाता, क्योंकि मैं चाहें कितनी ही बातें बनाऊं मगर ऐयारों की तरफ से ऐयारों का जी साफ होना मुश्किल है। आज मुझको ऐसा मौका मिला, क्योंकि आज का दिन आप पर बड़े संकट का था, जो कि महाराज शिवदत्त के धोखे और चालाकी ने आपको दिखाया!’’ इतना कह ज्योतिषीजी चुप हो गये।

ज्योतिषी जी की आखिरी बात ने सभी को चौंका दिया। तीनों आदमी धसक कर उनके पास आ बैठे। तेजसिंह ने कहा, ‘‘हां ज्योतिषीजी, जल्दी खुलासा कहिये, शिवदत्त ने क्योंकर धोखा दिया?’’ ज्योतिषी जी ने कहा, ‘‘महाराज शिवदत्त का यह कायदा है कि जब कोई भारी काम किया जाता है तो पहले मुझसे ज़रूर पूछता है, लेकिन चाहे राय दूं या मना करूं मगर करता है अपने ही मन की और धोखा भी खाता है। कई दफे पंडित बद्रीनाथ भी इन्हीं बातों से रंज हो गये कि जब अपने मन ही की करनी है तो ज्योतिषीजी से पूछने की ज़रूरत ही क्या है। आज रात को जो चालाकी उसने आपके साथ की उसके लिए भी मैंने मना किया था मगर कुछ न माना, आखिर नतीजा यह निकला कि घसीटासिंह और भगवानदत्त ऐयार की जान गई, इसका खुलासा हाल मैं तब कहूंगा जब आप इस बात का वादा कर लें कि मुझको अपना ऐयार साथी बनावेंगे।’’

ज्योतिषी की बात सुनकर कुमार ने तेजसिंह की तरफ देखा। तेजसिंह ने कहा, ‘‘ज्योतिषीजी, मैं बड़ी खुशी से आपको अपने साथ रखूंगा, परन्तु आपको इसके पहले अपने साफ दिल होने की कसम खानी पड़ेगी!’’

ज्योतिषीजी ने तेजसिंह के मन से शक मिटाने के लिए जनेऊ हाथ में लेकर कसम खाई, तेजसिंह ने उठकर उन्हें गले से लगा लिया और बड़ी खुशी से अपने ऐयारों की पंगत में मिला लिया। कुमार ने अपने गले से कीमती माला निकाल ज्योतिषीजी को पहना दी। ज्योतिषीजी ने कहा, ‘‘अब मुझसे सुनिए कि कुमार महल में क्यों कैद किये गये थे और जो रात का खून-खराबा हुआ उसका असल भेद क्या है।’’

‘‘जब आप लोग लश्कर से कुमारी को खोजने निकले थे तो रास्ते में बद्रीनाथ ऐयार ने आपको देख लिया था। आप लोगों के पहले वे वहां पहुंचे और चन्द्रकान्ता को दूसरी जगह छिपाने की नीयत से उस खोह में उसको लेने गये, मगर उनके पहुंचने के पहले ही कुमारी वहां से गायब हो गयी थीं और वे खाली हाथ वापस आये, तब नाज़िम को साथ ले वे आप लोगों की खोज में निकले और आपको उस जंगल में पाकर ऐयारी की। नाज़िम ने ढेला फेंका था, देवीसिंह उसको पकड़ने गये, तब तक बद्रीनाथ जो पहले ही से तेजसिंह बनकर आये थे, न मालूम किस चालाकी से आपको बेहोश कर किले में ले गये और जिसमें आपकी तबीयत से चन्द्रकान्ता की मुहब्बत जाती रहे और आप उसकी खोज न करें तथा उसके लिए महाराज शिवदत्त से लड़ाई न ठानें इसलिए भगवानदत्त और घसीटा को जो हम सभी से कम उम्र के थे, चन्द्रकान्ता और चपला बनाये गये जिनको आपने खत्म किया, बाकी हाल तो आप जानते ही हैं।’’

ज्योतिषीजी की बात सुनकर कुमार मारे खुशी के उछल पड़े। कहने लगे, ‘‘हाय, क्या गज़ब किया था। कितना भारी धोखा दिया! अब मालूम हुआ कि बेचारी चन्द्रकान्ता जीती-जागती हैं, मगर कहां हैं इसका पता नहीं, खैर यह भी मालूम हो जायेगा!’’

अब क्या करना चाहिए इस बात को सभी ने मिलकर सोचा और यह पक्का किया कि- १. महाराज शिवदत्त को तो उसी खोह में जिसमें ऐयार लोग पहले कैद किये गये थे, डाल देना चाहिए और दोहरा ताला लगा देना चाहिए क्योंकि पहले ताले का हाल जो शेर के मुंह से उसकी जुबान खींचने से खुलता है* बद्रीनाथ को मालूम हो गया मगर दूसरे ताले का हाल सिवाय तेजसिंह के अभी कोई नहीं जानता। २. कुमार को विजयगढ़ चले जाना चाहिए क्योंकि जब तक महाराज शिवदत्त कैद हैं लड़ाई न होगी मगर हिफाज़त के लिए कुछ फौज़ सरहद पर ज़रूर रहनी चाहिए। ३. देवीसिंह कुमार के साथ रहें। ४. तेजसिंह और ज्योतिषीजी कुमारी की खोज में जायें। कुछ और बातचीत करने के बाद सब कोई उठ खड़े हुए और वहां से चल पड़े।

* पहले भाग में आपने पढ़ा होगा कि खोह का दरवाज़ा जिसमें ऐयारों को तेजसिंह ने कैद किया था शेर के मुंह में हाथ डालकर जुबान खींचने से खुल जाता था। या ताला यदि कोई चाहे तो बना सकता है, असम्भव नहीं है, खूब गौर कर देखिये।

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