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उपन्यास >> चंद्रकान्ता

चंद्रकान्ता

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :272
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8395
आईएसबीएन :978-1-61301-007-5

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चंद्रकान्ता पुस्तक का ई-संस्करण

बारहवां बयान

दोपहर के वक़्त एक नाले के किनारे सुन्दर चट्टान पर दो कमसिन औरतें बैठी थीं। दोनों की मैली फटी साड़ी, दोनों के मुंह पर मिट्टी, खुले बाल, पैरों तक खूब धूल पड़ी हुई और चेहरे पर बदहवासी और परेशानी छाई हुई थी। चारों तरफ भयानक जंगल, खूनी जानवरों की भयानक आवाज़ें आ रही थीं। जब कभी ज़ोर से हवा चलती तो पेड़ों की घरघराहट से जंगल और भी डरावना मालूम पड़ता था।

इन दोनों औरतों के सामने नाले के उस पार एक तेंदुआ पानी पीने के लिए उतरा, इन्होंने इस तेंदुए को देखा मगर वह खूनी जानवर इन दोनों को न देख सका, क्योंकि जहां वे बैठी थीं सामने ही एक मोटा जामुन का पेड़ था।

इन दोनों में से एक जो ज़्यादा नाज़ुक थी उस तेंदुए को देख डरी और धीरे से दूसरी से बोली, ‘‘प्यारी सखी, देखो कहीं वह इस पार न उतर आवे।’’ उसने कहा, ‘‘नहीं सखी, वह इस पार न आवेगा, अगर आने का इरादा भी करेगा तो मैं पहले ही इन तीरों से उसको मार गिराऊंगी जो इस नाले के सिपाहियों को मार कर लेती आई हूं। इस वक़्त हमारे पास दो सौ तीर हैं और हम दोनों तीर चलाने वाली हैं, लो तुम भी एक तीर चढ़ा लो।’’ यह सुन उसने भी एक तीर कमान पर चढ़ाया मगर उसकी कोई ज़रूरत न पड़ी, वह तेंदुआ पानी पीकर तुरन्त ऊपर चढ़ गया और देखते-देखते गायब हो गया, तब इन दोनों में यूं बातें होने लगीं–

एकः क्यों चपला, कुछ मालूम पड़ता है, हम लोग किस जगह आ पहुंचे और यह कौन-सा जंगल है तथा विजयगढ़ की राह किधर है?

चपला : कुमारी, कुछ समझ में नहीं आता, बल्कि अभी तक मुझको भागने की धुन में यह भी नहीं मालूम कि हम किस तरफ चली आईं, विजयगढ़ किधर है, चुनार कहां छोड़ा, और नौगढ़ का रास्ता कहां है? सिवाय तुम्हारे साथ महल में रहने या विजयगढ़ की हद में घूमने के कभी इन जंगलो में तो आना हुआ नहीं, हां चुनार से सीधे विजयगढ़ का रास्ता जानती हूं, मगर उधर मैं इस सबब से नहीं गई कि आजकल हमारे दुश्मनों का लश्कर रास्ते में पड़ा है, कहीं ऐसा न हो कि देख ले, इसलिए मैं जंगल-ही-जंगल दूसरी तरफ भागी। खैर, देखो ईश्वर मालिक है, कुछ-न-कुछ रास्ते का पता लग ही जायेगा। मेरे बटुए में मेवा है, लो इसको खा लो और पानी पी लो, फिर देखा जायेगा।

कुमारी : इसको किसी और वक़्त के वास्ते रहने दो। क्या जाने हम लोगों को कितने दिन दुःख भोगना पड़े। यह जंगल खूब घना है, चलो बेर, मकोय तोड़कर खायें। अच्छा तो न मालूम पड़ेगा मगर क्या करें, समय काटना है।

चपला : अच्छा, जैसी तुम्हारी मर्जी।

चपला और चन्द्रकान्ता दोनों वहां से उठीं। नाले के ऊपर चढ़ इधर-उधर घूमने लगीं। दिन दोपहर से ज़्यादा ढल चुका था। पेड़ों की छांह में घूमती जंगली बेरों को तोड़ती खाती वे दोनों एक टूटे-फूटे उजाड़ मकान के पास पहुंची जिसके देखने से मालूम होता था कि यह मकान ज़रूर किसी बड़े राजा का बनाया हुआ होगा मगर अब टूट-फूट गया था।

चपला ने कुमारी चन्द्रकान्ता से कहा, ‘‘बहन, तुम मकान के टूटे दरवाज़े पर बैठो, मैं फल तोड़ लाऊं तो इसी जगह दोनों बैठकर खायें और इसके बाद तब इस मकान के अन्दर घुसकर देखें कि कैसा है। जब तक विजयगढ़ का रास्ता न मिले यही खंडहर हम लोगों के लिए अच्छा होगा, इसी में गुज़ारा करेंगे। कोई मुसाफिर या चरवाहा, इधर से आ निकलेगा तो विजयगढ़ का रास्ता पूछ लेंगे और तब यहां से जायेंगे।’’ कुमारी ने कहा, ‘‘अच्छी बात है, मैं इसी जगह बैठती हूं तुम कुछ फल तोड़ो लेकिन दूर मत जाना!’’ चपला ने कहा, ‘‘नहीं, मैं दूर न जाऊंगी, इसी जगह तुम्हारी आंखों के सामने रहूंगी।’’ यह कह चपला फल तोड़ने चली गई।

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