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उपन्यास >> चंद्रकान्ता

चंद्रकान्ता

देवकीनन्दन खत्री

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2021
पृष्ठ :272
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8395
आईएसबीएन :978-1-61301-007-5

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चंद्रकान्ता पुस्तक का ई-संस्करण

सत्रहवां बयान


अपनी जगह पर दीवान हरदयालसिंह को छोड़ तेज़सिंह और बद्रीनाथ को साथ लेकर महाराज जयसिंह विजयगढ़ से नौगढ़ की तरफ रवाना हुए। साथ में सिर्फ पांच सौ आदमियों का झमेला था। एक दिन रास्ते में लगा, दूसरे दिन नौगढ़ के करीब पहुंचकर डेरा डाला।

राजा सुरेन्द्रसिंह को महाराज के पहुंचने की खबर मिली। उसी वक़्त अपने मुसाहबों और सरदारों को साथ ले इस्तकबाल के लिए गये और अपने साथ शहर में ले आये।

महाराज जयसिंह के लिए पहले से ही मकान सजा रखा था, उसी में उनका डेरा डलवाया और ज़्याफत के लिए कहा, महाराज जयसिंह ने ज़्याफत से इनकार किया और कहा कि कई वजहों से मैं आपकी ज़्याफत मंजूर नहीं कर सकता, आप मेहरबानी करके इसके लिए जिद न करें बल्कि इसका सबब भी न पूछें कि ज़्याफत से क्यों इनकार करता हूं।

राजा सुरेन्द्रसिंह इसका सबब समझ गये और जी में बहुत खुश हुए।

रात के वक़्त कुंवर वीरेन्द्रसिंह और बाकी के ऐयार लोग भी महाराज जयसिंह से मिले। कुमार को बड़ी खुशी के साथ महाराज ने गले लगाया और अपने पास बैठाकर तिलिस्म का हाल पूछते रहे। कुमार ने बड़ी खूबसूरती के साथ तिलिस्म का हाल बयान किया।

रात को ही यह राय पक्की हो गई थी कि सवेरे सूरज निकलने के पहले तिलिस्मी खोह में सिद्धनाथ बाबा से मिलने के लिए रवाना होंगे। उसी मुताबिक दूसरे दिन तारों की रोशनी रहते ही महाराज जयसिंह, राजा सुरेन्द्रसिंह, कुंवर वीरेन्द्रसिंह, तेज़सिंह, देवीसिंह, बद्रीनाथ, पन्नालाल, रामनारायण और चुन्नीलाल वगैरह हज़ार आदमी की भीड़-भाड़ लेकर तिलिस्मी तहखाने की तरफ रवाना हुए। तहखाना बहुत दूर न था, सूरज निकले तक उस खोह (तहखाने) के पास जा पहुंचे।

कुंवर वीरेन्द्रसिंह ने महाराज जयसिंह और राजा सुरेन्द्रसिंह से हाथ जोड़कर अर्ज़ किया, ‘‘जिस वक़्त सिद्धनाथ योगी ने मुझे आप लोगों के लाने के लिए भेजा था उस वक़्त यह भी कह दिया था कि ‘जब वे लोग इस खोह के पास पहुंच जायें तब अगर हुक्म दें तो तुम उन लोगों को छोड़कर पहले अकेले आकर हम से मिल जाना’ अब आप कहें तो योगीजी के कहे मुताबिक पहले मैं जाकर उनसे मिल आऊं?’’

महाराज जयसिंह और राजा सुरेन्द्रसिंह ने कहा, ‘‘योगीजी की बात ज़रूर माननी चाहिए, तुम जाओ और उनसे मिलकर आओ, तब तक हमारा डेरा भी इसी जगंल में पड़ता है।

कुंवर वीरेन्द्रसिंह अकेले सिर्फ तेज़सिंह को साथ लेकर खोह में गये। जिस तरह हम पहले लिख चुके हैं उसी तरह खोह का दरवाज़ा खोल कई कोठरियों, मकान और बागों में घूमते दोनों आदमी उस बाग में पहुंचे जिसमें सिद्धनाथ रहते थे या जिसमें कुमारी चन्द्रकान्ता की तस्वीर का दरबार कुमार ने देखा था।

बाग के अन्दर पैर रखते ही सिद्धनाथ योगी से मुलाकात हुई जो दरवाज़े पास पहले ही से खड़े कुछ सोच रहे थे। कुंवर वीरेन्द्रसिंह और तेज़सिंह को आते देख उनकी तरफ बढ़े और पुकार के बोले, ‘‘आप लोग आ गये?’’

पहले दोनों ने दूर से प्रणाम किया और पास पहुंचकर उनकी बात का जवाब दिया।

कुमार : आपके हुक्म के मुताबिक महाराज जयसिंह और अपने पिता को खोह के बाहर छोड़कर आपसे मिलने आया हूं।

सिद्धनाथ : बहुत अच्छा किया जो उन लोगों को ले आये, आज कुमारी चन्द्रकान्ता से आप लोग ज़रूर मिलेंगे।

तेज़सिंह : आपकी कृपा है तो ऐसा ही होगा।

सिद्धनाथ : कहो, और तो सब कुशल है? विजयगढ़ और नौगढ़ में किसी तरह का उत्पात तो नहीं हुआ?

तेज़सिंह : (ताज्जुब से उनकी तरफ देखकर) हां, उत्पात तो हुआ था, कोई ज़ालिमखां नामी दोनों राजाओं का दुश्मन पैदा हुआ था।

सिद्धनाथ : हां, यह तो मालूम है बेशक पंडित बद्रीनाथ अपने फन में बड़ा ही उस्ताद है, अच्छी चालाकी से उसे गिरफ्तार किया। खूब हुआ जो वे लोग मारे गये, अब उनके संगी-साथियों का दोनों राजाओं से दुश्मनी करने का हौसला न पड़ेगा। आओ, टहलते हुए हम लोग बात करें।

कुमार : बहुत अच्छा।

तेज़सिंह : जब आपको यह सब हाल मालूम है तो यह भी ज़रूर मालूम होगा कि ज़ालिमखां कौन था?

सिद्धनाथस : यह तो नहीं मालूम कि वह कौन था, मगर अन्दाज से मालूम होता है कि शायद नाज़िम और अहमद के रिश्तेदारों में से कोई होगा।

कुमार : ठीक है, जो आप सोचते हैं वही होगा।

सिद्धनाथ : महाराज शिवदत्त तो जगंल में चले गये?

कुमार : जी हां, वे तो हमारे पिता से कह गये हैं कि अब तपस्या करेंगे।

सिद्धनाथ : जो हो, मगर दुश्मन का विश्वास कभी न करना चाहिए।

कुमार : क्या वह फिर दुश्मनी पर कमर बांधेंगे?

सिद्धनाथ : कौन ठिकाना?

कुमार : अब हुक्म हो तो बाहर जाकर अपने पिता और महाराज जयसिंह को ले आऊं?

सिद्धनाथ : हां, मगर पहले यह तो सुन लो कि हमने तुमको उन लोगों से पहले क्यों बुलाया?

कुमार : कहिए।

सिद्धनाथ : कायदे की बात है कि जिस चीज़ को जी बहुत चाहता है अगर वह खो गई हो और बहुत मेहनत करने या बहुत हैरान होने पर एकाएक ताज्जुब के साथ मिल जाये तो उसका चाहने वाला उस पर इस तरह टूटता है जैसे अपने शिकार पर भूखा बाज। वह हम जानते हैं कि चन्द्रकान्ता में और तुममें बहुत ज़्यादा मुहब्बत है, अगर एकाएक दोनों राजाओं के सामने तुम उसे देखोगे या वह तुम्हें देखेगी तो ताज्जुब नहीं कि उन लोगों के सामने तुमसे या कुमारी चन्द्रकान्ता से किसी तरह की बेअदबी हो जाये या जोश में आकर तुम उसके पास ही जा खड़े हो तो भी मुनासिब न होगा। इसलिए मेरी राय है कि उन लोगों के पहले ही तुम कुमारी से मुलाकात कर लो। आओ हमारे साथ चले आओ।

अहा, इस वक़्त कुमार के दिल की हुई। मुद्दत के बाद सिद्धनाथ बाबा की कृपा से आज उस कुमारी चन्द्रकान्ता से मुलाकात होगी जिसके वास्ते दिन-रात परेशान थे, राजपाट जिसकी एक मुलाकात पर न्यौछावर कर दिया था, जान तक से हाथ धो बैठे थे। एकाएक उससे मुलाकात होगी-सो भी ऐसे वक़्त पर जब किसी तरह का खटका नहीं, किसी तरह का रंज नहीं, कोई दुश्मन बाकी नहीं। ऐसे वक़्त में कुमार की खुशी का क्या कहना! कलेजा उछलने लगा। मारे खुशी के सिद्धनाथ योगी की बात का जवाब तक न दे सके और उनके पीछे-पीछे रवाना हो गये।

थोड़ी दूर कमरे की तरफ गये होंगे कि एक लौडी फूल तोड़ती हुई नज़र पड़ी जिसे बुला कर सिद्धनाथ ने कहा, ‘‘तू अभी कुमारी चन्द्रकान्ता के पास जा और कह कि कुंवर वीरेन्द्रसिंह तुमसे मुलाकात करने आ रहे हैं, तुम अपनी सखियों के साथ अपने कमरे में जाकर बैठो।’’

यह सुनते ही वह लौडी दौड़ती हुई एक तरफ चली गई और सिद्धनाथ, कुमार तथा तेज़सिंह को साथ ले बाग में इधर-उधर घूमने लगे। कुंवर वीरेन्द्रसिंह और तेज़सिंह दोनों अपनी-अपनी फिक्र में लग गये। तेज़सिंह को चपला से मिलने की खुशी थी। दोनों यह सोचने लगे कि किस हालत में मुलाकात होगी, उससे क्या बातचीत करेंगे, क्या पूछेंगे, वह हमारी शिकायत करेगी तो क्या जवाब देंगे? इसी सोच में दोनों ऐसे लीन हो गये कि फिर सिद्धनाथ योगी से बात न की चुपचाप बहुत देर तक योगीजी के पीछे-पीछे घूमते रह गये।

घूम-फिर कर इन दोनों को साथ लिए हुए सिद्धनाथ योगी उस कमरे के पास पहुंचे जिसमें कुमारी चन्द्रकान्ता की तस्वीर का दरबार देखा था। वहां पर सिद्धनाथ ने कुमार की तरफ देख कर कहा–

‘‘जाओ इस कमरे में कुमारी चन्द्रकान्ता और उसकी सखियों से मुलाकात करो, मैं तब तक दूसरा काम करता हूं।’’

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